ठेकेदारों पर कार्रवाई में स्टाफ की कमी, लेकिन कच्ची शराब पर तुरंत दबिश? आबकारी विभाग की कार्यशैली पर उठे सवाल
ग्रामीणों का आरोप- महुआ शराब पर कार्रवाई तेज, लेकिन गांव-गांव शराब पहुंचाने वाले नेटवर्क पर सुस्ती क्यों?

संवाददाता शैलेंद्र गुप्ता शाहपुर
शाहपुर। भौंरा क्षेत्र में गांव-गांव शराब बिक्री की शिकायतों के बीच आबकारी विभाग द्वारा स्टाफ की कमी का हवाला दिए जाने पर अब नए सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब लाइसेंसधारी ठेकेदारों से जुड़ी कथित अनियमितताओं या गांवों में शराब पहुंचने की शिकायतों की बात आती है, तब विभाग स्टाफ की कमी की बात करता है। वहीं, महुआ और कच्ची शराब के खिलाफ कार्रवाई के मामलों में विभागीय टीम मौके पर पहुंचकर तुरंत कार्रवाई करती दिखाई देती है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि कच्ची शराब के खिलाफ अभियान चलाने के लिए अमला उपलब्ध हो सकता है, तो फिर गांवों में शराब बिक्री की शिकायतों की जांच के लिए पर्याप्त स्टाफ क्यों नहीं मिल पाता?
दोहरे मापदंड के आरोप
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि अवैध महुआ और कच्ची शराब पर कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन इसके साथ-साथ उन शिकायतों की भी गंभीर जांच होनी चाहिए जिनमें गांवों में ठेकेदारों के माध्यम से शराब पहुंचने के आरोप लगाए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि एक प्रकार की अवैध गतिविधि पर त्वरित कार्रवाई होती है और दूसरी प्रकार की शिकायतों पर केवल स्टाफ की कमी का हवाला दिया जाता है, तो इससे विभाग की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या शिकायतों की निष्पक्ष जांच होगी?
बीजादेही, सोनादेह, ढोढरामऊ, डाबरी, बानाबेहड़ा, घपाड़ा, कछार, हांडीपानी, गुरगुंदा, निशाना, पाठई और बरजोरपुर सहित कई गांवों में शराब उपलब्ध होने की शिकायतें सामने आई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि विभाग इन गांवों में संयुक्त जांच अभियान चलाए तो स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
संरक्षण के आरोप, लेकिन जांच जरूरी
कुछ स्थानीय लोगों ने यह आशंका भी जताई है कि ठेकेदारों से जुड़ी शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने से संरक्षण की चर्चाएं जन्म ले रही हैं। हालांकि, ऐसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि विभाग पर उठ रहे सवालों को खत्म करना है, तो उसे गांव-गांव विशेष अभियान चलाकर यह दिखाना होगा कि कार्रवाई बिना किसी भेदभाव के की जाती है।
बड़ा सवाल
जब आबकारी विभाग कच्ची शराब के मामलों में त्वरित कार्रवाई कर सकता है, तो गांवों में शराब बिक्री की शिकायतों की जांच के लिए स्टाफ की कमी क्यों आड़े आती है? क्या यह केवल संसाधनों की समस्या है या फिर विभाग को अपने ऊपर उठ रहे सवालों का जवाब देने के लिए जमीनी कार्रवाई करनी होगी?







