मां जिनवाणी का जन्मोत्सव श्रुत पंचमी पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया
तारण तरण दिगंबर जैन चैत्यालय में हुआ भव्य आयोजन, जिनवाणी के महत्व पर दिया गया विशेष संदेश

गाडरवारा। मां जिनवाणी का जन्मोत्सव पर्व श्रुत पंचमी श्री तारण तरण दिगंबर जैन चैत्यालय में बाल ब्रह्मचारी वैराग्य भैया एवं ब्रह्मचारी सुरेश भैया के सानिध्य में श्रद्धा, भक्ति और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर समनापुर से तारण तरण पाठशाला के नौनिहाल एवं अनेक श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल हुए।
सिद्ध मंत्र जाप और छद्मस्त वाणी पाठ से हुई शुरुआत
श्रुत पंचमी पर्व के अवसर पर सुबह 5 बजे से चैत्यालय में सिद्ध मंत्रों का जाप एवं श्री छद्मस्त वाणी पाठ का आयोजन किया गया। इसके बाद विधिपूर्वक मंदिर विधान संपन्न हुआ। धार्मिक वातावरण में श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से पूजा-अर्चना की।
पालने में विराजित कर झुलाया गया मां जिनवाणी शास्त्र
विशेष आयोजन के तहत लिपिबद्ध मां जिनवाणी स्वरूप शास्त्र को पालने में विराजित कर श्रद्धालुओं द्वारा पालना झुलाया गया। इस दौरान चैत्यालय परिसर भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर नजर आया।
जिनवाणी के महत्व पर ब्रह्मचारी वैराग्य भैया का उद्बोधन
बाल ब्रह्मचारी वैराग्य भैया ने अपने प्रवचन में जिनवाणी के महत्व को विस्तार से बताते हुए कहा कि भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के लगभग 683 वर्ष बाद आचार्य धरसेन मुनिराज हुए। उन्होंने पंचम काल के जीवों के आत्मकल्याण की भावना से प्रेरित होकर जिनवाणी को लिपिबद्ध कराने का महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ कराया।
उन्होंने बताया कि आचार्य धरसेन ने आचार्य भूतबली एवं पुष्पदंत मुनिराज को शिक्षा देकर जिन श्रुत और जिनवाणी को लिपिबद्ध कराया, जिससे आने वाली पीढ़ियों तक धर्म का ज्ञान सुरक्षित रह सके।
केवल दर्शन नहीं, प्रतिदिन करें स्वाध्याय
वैराग्य भैया ने कहा कि श्रद्धालुओं को केवल जिनवाणी के दर्शन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आत्मकल्याण के लिए प्रतिदिन जिनवाणी का अध्ययन और स्वाध्याय भी करना चाहिए। उन्होंने बताया कि श्रुत पंचमी का दिन वही पावन अवसर है, जब पहली बार जिन श्रुत, जिनागम और जिन सूत्र के रूप में श्री षट्खण्डागम ग्रंथराज प्राप्त हुआ था।
समनापुर से आए श्रद्धालुओं का किया आभार व्यक्त
कार्यक्रम के समापन पर श्री सकल तारण तरण जैन समाज के अध्यक्ष राकेश जैन ने समनापुर से पधारे सभी श्रद्धालुओं, बच्चों एवं महानुभावों का आभार व्यक्त किया तथा धर्म और संस्कारों के संरक्षण के लिए ऐसे आयोजनों की महत्ता बताई।







