साईंखेड़ा 10 घंटे से जाम में कैद स्टेट हाईवे 44: आखिर प्रशासन कब जागेगा, कितनी मौतों के बाद रुकेगा डंपरों का आतंक?
नरसिंहपुर जिले के साईंखेड़ा स्थित स्टेट हाईवे 44 पर डंपर हादसे के बाद 10 घंटे से ज्यादा समय से चक्का जाम जारी। प्रशासन पर लापरवाही के आरोप, ग्रामीणों में भारी आक्रोश।

साईंखेड़ा/नरसिंहपुर: जिले का स्टेट हाईवे 44 अब लोगों के लिए सड़क नहीं बल्कि मौत का रास्ता बनता जा रहा है। शनिवार दोपहर नर्मदा रिसोर्ट के पास हुए दर्दनाक डंपर हादसे में तूमड़ा निवासी 18 वर्षीय युवक की मौत के बाद लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और हजारों ग्रामीण सड़क पर उतर आए।
घटना के 10 घंटे से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी चक्का जाम जारी है। हालात इतने बिगड़ गए कि सड़क पर फंसे वाहनों को वापस लौटाना पड़ा। हाईवे पर कई किलोमीटर लंबा जाम लगा हुआ है और प्रशासन अब तक कोई ठोस समाधान निकालने में पूरी तरह विफल नजर आ रहा है।
आखिर कब तक डंपरों के नीचे कुचलती रहेंगी जिंदगियां?
स्थानीय लोगों का कहना है कि स्टेट हाईवे 44 पर बेलगाम दौड़ रहे डंपर और भारी वाहन लगातार लोगों की जान ले रहे हैं। हफ्ते भर पहले हुए हादसों की तस्वीरें अभी लोगों के जेहन से उतरी भी नहीं थीं कि एक और परिवार उजड़ गया।
ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर कितनी मौतों के बाद प्रशासन जागेगा? क्या लोगों की जान की कोई कीमत नहीं बची? क्या सड़कें सिर्फ भारी वाहनों के लिए हैं और आम नागरिकों की सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी गई है?
डॉक्टर नहीं, व्यवस्था नहीं, सिर्फ वादे
घटना के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल भी खुलकर सामने आ गई। 40 गांवों के इस ब्लॉक स्तरीय स्वास्थ्य केंद्र में एक भी डॉक्टर मौजूद नहीं है। दुख की घड़ी में मृतक के परिजनों को भीषण गर्मी में 25 किलोमीटर दूर गाडरवारा अस्पताल जाना पड़ा।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समय पर स्वास्थ्य सुविधाएं और आपातकालीन व्यवस्था उपलब्ध होती तो शायद कई जिंदगियां बच सकती थीं। लेकिन प्रशासन सिर्फ कागजों में विकास दिखाने में व्यस्त है, जमीन पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।
सड़क पर शव रखकर प्रदर्शन, प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी
हजारों की संख्या में ग्रामीणों ने सड़क पर शव रखकर प्रदर्शन किया। मौके पर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे, लेकिन लोगों का आरोप है कि अधिकारी सिर्फ आश्वासन देने पहुंचे, समाधान लेकर नहीं।
ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि लगातार ज्ञापन, धरना और विरोध प्रदर्शन के बावजूद हाईवे पर सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। न स्पीड कंट्रोल, न ट्रैफिक निगरानी और न ही भारी वाहनों पर कार्रवाई।
लोगों में सवाल — जिम्मेदार कौन?
अब क्षेत्र में एक ही सवाल गूंज रहा है — आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन है?
क्या प्रशासन की लापरवाही ऐसे ही मासूमों की जान लेती रहेगी?
क्या डंपरों का आतंक यूं ही चलता रहेगा?
और क्या हर हादसे के बाद सिर्फ मुआवजे और आश्वासनों का खेल चलता रहेगा?







