मध्य प्रदेश

चालान से आगे की सोच: कार्रवाई के साथ हेलमेट उपलब्ध कराना कितना असरदार?

सात दिनों में 1,224 चालान, ₹4.21 लाख समन शुल्क और 319 लाइसेंस निलंबन प्रकरण; अब सवाल—कार्रवाई के साथ स्थायी आदत बनाने की पहल कब?

राकेश एक्का | खोजी पत्रकार

नर्मदापुरम। हेलमेट और सीटबेल्ट को लेकर पुलिस की कार्रवाई कोई नई बात नहीं है। समय-समय पर विशेष अभियान चलाए जाते हैं, चौराहों और प्रमुख मार्गों पर वाहन जांच होती है, नियम तोड़ने वालों के चालान काटे जाते हैं और जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इसके बावजूद सड़कों पर आज भी बड़ी संख्या में ऐसे वाहन चालक दिखाई देते हैं, जो हेलमेट को सुरक्षा के बजाय महज पुलिस की कार्रवाई से बचने का साधन समझते हैं।

नर्मदापुरम में 28 सितंबर से 8 अक्टूबर तक चलाए जा रहे विशेष अभियान के पहले सात दिनों में पुलिस ने हेलमेट और सीटबेल्ट नियमों के उल्लंघन पर 1,224 चालान किए। इस दौरान ₹4 लाख 21 हजार 400 का समन शुल्क वसूला गया, जबकि 319 लाइसेंस निलंबन प्रकरण आरटीओ को भेजे गए।

आंकड़ों के मुताबिक, 952 कार्रवाई हेलमेट नहीं पहनने और 272 कार्रवाई सीटबेल्ट का उपयोग नहीं करने वालों के विरुद्ध की गई। वहीं, विद्यार्थियों और आम नागरिकों को सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए 68 जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।

आंकड़े बताते हैं कि कार्रवाई हो रही है। लेकिन क्या कार्रवाई के बाद आदत भी बदल रही है?

यही वह सवाल है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

क्या केवल चालान से बदल सकती है आदत?

चालान कानून के पालन का जरूरी हिस्सा है। नियम तोड़ने वाले पर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन यदि कोई व्यक्ति बिना हेलमेट पकड़ा जाता है और उसके पास हेलमेट ही नहीं है, तो क्या केवल जुर्माना लगाने के बजाय कानून और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के दायरे में कोई सुधारात्मक व्यवस्था भी विकसित की जा सकती है?

मसलन, अधिकृत व्यवस्था के तहत हेलमेट उपलब्ध कराने, हेलमेट खरीदने के लिए प्रेरित करने अथवा वाहन की सुपुर्दगी से जुड़ी वैधानिक प्रक्रिया में हेलमेट की उपलब्धता सुनिश्चित करने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।

यह वर्तमान पुलिस व्यवस्था का दावा नहीं, बल्कि एक पत्रकार के तौर पर प्रस्तुत सुझाव है।

इसका उद्देश्य चालानी कार्रवाई को खत्म करना नहीं, बल्कि उसके साथ ऐसा व्यवहारिक समाधान जोड़ना है, जिससे कार्रवाई का असर लंबे समय तक दिखाई दे।

एक चालान बनाम एक स्थायी आदत

मान लीजिए किसी वाहन चालक पर बिना हेलमेट चलने के कारण चालान हुआ। उसने जुर्माना भर दिया और अगले दिन फिर बिना हेलमेट सड़क पर निकल गया।

तो सवाल यह है कि क्या सिर्फ आर्थिक दंड से सड़क सुरक्षा का उद्देश्य पूरा हो गया?

इसके विपरीत यदि उसी कार्रवाई के बाद वह व्यक्ति हेलमेट खरीदता है, उसे नियमित रूप से पहनने की आदत बनाता है और अपने परिवार के दूसरे सदस्यों को भी हेलमेट पहनने के लिए प्रेरित करता है, तो इसका प्रभाव केवल एक चालान तक सीमित नहीं रहेगा।

चालान तत्काल प्रभाव डाल सकता है, लेकिन आदत जीवन बचा सकती है।

पुलिस हर सड़क पर नहीं हो सकती मौजूद

किसी भी शहर की हर सड़क, हर गली और हर चौराहे पर पुलिसकर्मी की मौजूदगी संभव नहीं है। यदि हेलमेट पहनने की वजह सिर्फ यह हो कि सामने पुलिस खड़ी है, तो पुलिस के नजर से हटते ही नियम भी पीछे छूट सकता है।

लेकिन यदि व्यक्ति के भीतर यह सोच विकसित हो जाए कि—

“पुलिस दिखे या न दिखे, बिना हेलमेट बाइक नहीं चलाऊंगा।”

तो यही सड़क सुरक्षा अभियान की वास्तविक सफलता होगी।

सफलता का पैमाना सिर्फ चालान क्यों?

सड़क सुरक्षा अभियान की सफलता को केवल इस आधार पर क्यों मापा जाए कि कितने चालान काटे गए और कितनी राशि वसूली गई?

इसके साथ कुछ दूसरे सवाल भी पूछे जाने चाहिए—

  • कितने वाहन चालकों ने इसके बाद नियमित रूप से हेलमेट पहनना शुरू किया?
  • कितने लोगों ने अपने परिवार के सदस्यों को हेलमेट पहनने के लिए प्रेरित किया?
  • कितने दोपहिया वाहन चालकों ने पुलिस की मौजूदगी के बिना भी हेलमेट पहनना शुरू किया?
  • क्या लगातार कार्रवाई के साथ सड़क सुरक्षा की स्थायी संस्कृति विकसित हो रही है?

यदि इन सवालों के जवाब तलाशे जाएं, तो अभियान की सफलता का आकलन केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि बदली हुई आदतों से किया जा सकेगा।

हेलमेट पुलिस से बचने के लिए नहीं, जिंदगी बचाने के लिए

आखिरकार हेलमेट किसी पुलिसकर्मी से बचने के लिए नहीं है। यह दुर्घटना की स्थिति में सिर की गंभीर चोट के जोखिम को कम करने के लिए है।

चालान कानून का हिस्सा है।
जागरूकता समाज की जिम्मेदारी है।
लेकिन हेलमेट पहनना सबसे पहले अपने जीवन और अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी है।

घर से निकलते समय यह मत सोचिए कि रास्ते में पुलिस मिलेगी या नहीं।

बस इतना सोचिए—

घर पर कोई आपका इंतजार कर रहा है।

पुलिस दिखे या न दिखे, हेलमेट सिर पर होना चाहिए।

क्योंकि सड़क पर आपकी मंजिल से ज्यादा जरूरी है—

सुरक्षित घर लौटना।

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