राष्ट्रीय

पृथ्वी केवल एक भौतिक सत्ता नहीं, बल्कि जीवन का विराट आधार

पृथ्वी दिवस पर साहित्यिक विमर्श – सुशील शर्मा

समय की अनादि-अनंत धारा में प्रवाहित यह पृथ्वी केवल एक भौतिक सत्ता नहीं, बल्कि जीवन का वह विराट आधार है, जिसकी गोद में समस्त सृष्टि अपनी विविधता और विस्तार के साथ फलती-फूलती रही है। भूगोल की पुस्तकों में अंकित सीमाएँ, प्रागैतिहासिक ग्रंथों में दर्ज युगों का लेखा-जोखा और वैज्ञानिक निष्कर्ष ये सभी मिलकर भी उस जीवंत चेतना को पूर्णतः अभिव्यक्त नहीं कर पाते, जो इस धरती के कण-कण में विद्यमान है।

पृथ्वी दिवस का आयोजन मात्र एक औपचारिक स्मरण नहीं, बल्कि एक गहन आत्ममंथन का अवसर है—यह सोचने का कि जिस धरती ने हमें जीवन दिया, हम उसके प्रति कितने उत्तरदायी हैं।

आधुनिक युग में विकास की परिभाषा ने एक नया रूप ले लिया है। तकनीकी उन्नति, शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार को प्रगति का प्रतीक माना जाने लगा है। ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कों और तीव्र गति से चलते जीवन ने हमें यह भ्रम दे दिया है कि हम निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।

किन्तु इस विकास के साथ एक गहरी विसंगति भी जुड़ी हुई है। संसाधनों का अनियंत्रित दोहन, जलस्रोतों का क्षरण, वनों की कटाई और प्रदूषण ये सभी उस कीमत का संकेत हैं, जो हम अपनी तथाकथित प्रगति के लिए चुका रहे हैं।
वास्तविकता यह है कि पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा कई बार एक औपचारिक विमर्श बनकर रह गया है। चर्चाएँ होती हैं, योजनाएँ बनती हैं, पर व्यवहार में परिवर्तन नगण्य रहता है। यह स्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि समस्या केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि हमारी दृष्टि और प्राथमिकताओं की है।

जल पृथ्वी पर जीवन का मूल तत्व है। परंतु आज यही जल संकट का कारण बनता जा रहा है। हमने वर्षा को मापने के लिए वैज्ञानिक इकाइयों का सहारा लिया, पर उसकी बूँदों के महत्व को समझने का प्रयास नहीं किया।प्रत्येक बूँद अपने भीतर जीवन की संभावना समेटे होती है। जब यह बूँदें व्यर्थ बह जाती हैं, तब केवल जल का ही नहीं, जीवन के आधार का भी ह्रास होता है।

भारत में जल संकट विशेष रूप से चिंताजनक है। पारंपरिक जलस्रोत कुएँ, तालाब, बावड़ियाँ और पोखर जो कभी जल संरक्षण के सशक्त माध्यम थे, आज उपेक्षा के कारण विलुप्ति की ओर अग्रसर हैं।

भूजल स्तर में निरंतर गिरावट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हमने जल प्रबंधन की अपनी परंपरागत समझ को भुला दिया है।

भारतीय संस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता का भाव सदैव विद्यमान रहा है। यहाँ पृथ्वी को माता, नदियों को जीवनदायिनी और वृक्षों को देवतुल्य माना गया है।यह दृष्टिकोण केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं था, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन की एक गहन समझ पर आधारित था।

हमारे पूर्वजों ने जल, भूमि और वन संसाधनों के संरक्षण के लिए जो व्यवस्थाएँ विकसित की थीं, वे आज भी प्रासंगिक हैं।किन्तु आधुनिकता के प्रभाव में हमने इन परंपराओं को उपेक्षित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप आज हम अनेक पर्यावरणीय संकटों का सामना कर रहे हैं।

पर्यावरणीय संकट केवल किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह एक वैश्विक समस्या है, जिसका प्रभाव सम्पूर्ण मानवता पर पड़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, हिमनदों का पिघलना और जैव-विविधता का क्षरण ये सभी संकेत हैं कि पृथ्वी का संतुलन बिगड़ रहा है। विश्व के विकसित और विकासशील सभी देश इस संकट से जूझ रहे हैं। अतः इसके समाधान के लिए सामूहिक और समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।

विकास आवश्यक है, परंतु वह संतुलित और पर्यावरण के अनुकूल होना चाहिए। यदि विकास प्रकृति के विनाश पर आधारित होगा, तो वह दीर्घकाल में मानव अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न करेगा इसलिए आवश्यक है कि हम ऐसी विकास नीतियाँ अपनाएँ, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकें।

वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम अपनी परंपरागत ज्ञान प्रणाली को पुनः समझें और उसे आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वित करें। जल संरक्षण, वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा।नई पीढ़ी को यह शिक्षित करना आवश्यक है कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक विषय नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।

पृथ्वी की अस्मिता की बहाली केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक सामूहिक संकल्प है।
जब प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूमिका को समझेगा और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन करेगा, तभी यह संभव हो सकेगा।

पृथ्वी दिवस हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन में छोटे-छोटे परिवर्तन लाएँ और एक बड़े उद्देश्य की ओर अग्रसर हों।अंततः, यह स्मरणीय है कि पृथ्वी केवल हमारा निवास स्थान नहीं,बल्कि हमारा अस्तित्व है।यदि हम इसकी रक्षा करेंगे,तो यह हमें जीवन देती रहेगी;अन्यथा, हमारा भविष्य स्वयं ही संकट में पड़ जाएगा।

आइए, हम सब मिलकर इस पृथ्वी की अस्मिता की रक्षा का संकल्प लें ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस सुंदर, संतुलित और जीवनदायिनी धरती का अनुभव कर सकें।

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