अतिक्रमण हटाओ अभियान के बाद गरीब परिवारों पर टूटा रोजी-रोटी का संकट, एक परिवार ने, बीमार बेटी के इलाज हेतु मांगी इच्छामृत्यु
थैलेसिमिया पीड़ित बेटी का इलाज कराने के लिए दर-दर भटक रहा चौरे परिवार, मुख्यमंत्री कार्यक्रम में लगाई इच्छामृत्यु की गुहार

गाडरवारा।
शहर में इन दिनों चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान ने जहां मुख्य सड़कों और बाजार क्षेत्रों को अतिक्रमण से राहत दिलाई है, वहीं दूसरी ओर इस कार्रवाई ने उन गरीब और मेहनतकश परिवारों की जिंदगी को गहरे संकट में धकेल दिया है, जिनकी पूरी आजीविका सड़क किनारे लगने वाली छोटी दुकानों और ठेलों पर निर्भर थी।
गाडरवारा में ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जो रोज कमाते थे और उसी कमाई से परिवार का पेट भरते थे। किसी की चाय-नाश्ते की दुकान थी, कोई फल-सब्जी बेचता था, तो कोई छोटी गुमटी चलाकर बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च संभाल रहा था। लेकिन अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद कई परिवारों की दुकानें हट गईं और उनके सामने अचानक बेरोजगारी का संकट खड़ा हो गया।
इन्हीं प्रभावित परिवारों में एक नाम है बसंत चौरे और रोशनी चौरे का, जिनकी कहानी अब पूरे क्षेत्र में लोगों को भावुक कर रही है।
बेटी की बीमारी और टूटी रोजी-रोटी
बसंत चौरे ने भारी मन से बताया कि उनकी 14 वर्षीय बेटी योगिता चौरे पिछले कई वर्षों से थैलेसिमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही है। यह ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर में खून की कमी लगातार बनी रहती है और मरीज को नियमित रूप से ब्लड चढ़ाना पड़ता है।
परिवार के अनुसार योगिता को हर महीने दो यूनिट ब्लड चढ़ाना पड़ता है। इलाज के लिए उसे समय-समय पर भोपाल ले जाना पड़ता है। दवाइयों, जांच, सफर और अन्य मेडिकल खर्चों में हर महीने हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं।
बसंत चौरे बताते हैं कि हॉस्पिटल रोड पर उनकी एक छोटी सी चाय-नाश्ते की दुकान थी। वही दुकान परिवार की जिंदगी का सहारा थी। दुकान से होने वाली कमाई से बेटी का इलाज, घर का राशन, मकान का किराया और बाकी खर्च पूरे होते थे।
लेकिन अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान प्रशासन ने उनकी दुकान भी हटा दी। दुकान हटते ही परिवार की आमदनी पूरी तरह बंद हो गई और अब हालात ऐसे बन गए हैं कि परिवार के सामने दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो रहा है।
“दुकान गई तो सबकुछ चला गया”
बसंत चौरे कहते हैं कि
“हम कोई बड़े व्यापारी नहीं हैं। छोटी सी दुकान से जैसे-तैसे घर चलता था। बेटी की बीमारी पहले ही जिंदगी को कठिन बना चुकी थी, ऊपर से दुकान हटने के बाद अब समझ नहीं आ रहा कि इलाज कराएं या परिवार चलाएं।”
माता रोशनी चौरे की आंखों में भी बेटी की चिंता साफ दिखाई देती है। उनका कहना है कि बेटी का इलाज रुकना मतलब उसकी जिंदगी खतरे में पड़ना है।
प्रशासन से लगाई मदद की गुहार
परिवार ने बताया कि उन्होंने अपनी समस्या लेकर कलेक्टर रजनी सिंह से भी मुलाकात की थी। उन्होंने प्रशासन से सिर्फ इतनी मांग की थी कि कहीं अस्थायी रूप से दुकान लगाने की अनुमति दे दी जाए ताकि परिवार फिर से अपनी रोजी-रोटी शुरू कर सके।
लेकिन परिवार का आरोप है कि अब तक उन्हें कोई राहत नहीं मिल सकी।
मुख्यमंत्री कार्यक्रम में पहुंचकर मांगी इच्छामृत्यु
आर्थिक संकट और बेटी की बीमारी से परेशान चौरे परिवार 13 मई को मुंगवानी में आयोजित मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यक्रम में भी पहुंचा था। वहां उन्होंने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा कि यदि परिवार को रोजगार और बेटी के इलाज के लिए मदद नहीं मिली तो उनके पास इच्छामृत्यु मांगने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
कार्यक्रम के दौरान परिवार का दर्द देखकर कई लोग भावुक हो गए। सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि अतिक्रमण हटाना जरूरी हो सकता है, लेकिन उन गरीब परिवारों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई जिनकी जिंदगी पूरी तरह उन्हीं छोटी दुकानों पर टिकी हुई थी।
गरीब परिवारों की बढ़ती चिंता
स्थानीय लोगों का कहना है कि गाडरवारा में ऐसे कई परिवार हैं जिनके लिए सड़क किनारे का छोटा व्यवसाय ही जीविका का एकमात्र साधन था। अचानक कार्रवाई के बाद वे बेरोजगार हो गए हैं। कई परिवार अब कर्ज, भूख और बीमारी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
लोगों का मानना है कि प्रशासन को अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ गरीब परिवारों के पुनर्वास, वैकल्पिक रोजगार और अस्थायी व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।
समाज और प्रशासन से मदद की उम्मीद
फिलहाल चौरे परिवार समाजसेवियों, जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से मदद की उम्मीद लगाए बैठा है। परिवार की सबसे बड़ी चिंता यही है कि योगिता का इलाज किसी भी हालत में बंद न हो।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस भावुक और गंभीर मामले में क्या कदम उठाता है और क्या एक बीमार बच्ची के परिवार को फिर से जीवन जीने का सहारा मिल पाता है या नहीं।







