आड़ेगांव कला में सैला नृत्य और सैरे गायन का भव्य आयोजन, विलुप्त होती लोक परंपराओं को सहेज रहे ग्रामीण
गाडरवारा के ग्राम आड़ेगांव कला में वर्षा ऋतु पर पारंपरिक सैला नृत्य और सैरे गायन का भव्य आयोजन हुआ। ग्रामीणों ने लोक संस्कृति और विलुप्त होती परंपराओं के संरक्षण का संदेश दिया।

गाडरवारा/साईंखेड़ा। आधुनिकता के दौर में जहां पारंपरिक लोक कलाएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, वहीं गाडरवारा तहसील के ग्राम आड़ेगांव कला के ग्रामीण अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने का सराहनीय प्रयास कर रहे हैं। वर्षा ऋतु के अवसर पर गांव में पारंपरिक सैला नृत्य एवं सैरे गायन का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
सैला नृत्य मध्य भारत की प्राचीन लोक परंपराओं में शामिल है। इस नृत्य में पुरुष कलाकार हाथों में डंडे लेकर तालबद्ध ढंग से एक-दूसरे के डंडों को टकराते हुए आकर्षक प्रस्तुति देते हैं। मृदंग, टिमकी और गुंबद जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर धुन पर प्रस्तुत यह नृत्य दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। वहीं सामूहिक स्वर में गाए जाने वाले सैरे गीत पूरे वातावरण को लोक संस्कृति के रंग में रंग देते हैं।

ग्रामीणों ने बताया कि वर्षा ऋतु में खेती-बाड़ी के प्रमुख कार्यों से कुछ समय की राहत मिलने पर ऐसे सांस्कृतिक आयोजन वर्षों से होते आ रहे हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना, सामाजिक एकता और भाईचारे को मजबूत करना तथा लोक परंपराओं का संरक्षण करना भी है।
ग्रामीणों का कहना है कि सैला नृत्य और सैरे गायन किसानों की पहचान हैं। यह लोक परंपरा प्रकृति, खेती और ग्रामीण जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। यदि इन सांस्कृतिक आयोजनों को निरंतर बढ़ावा दिया जाए तो आने वाली पीढ़ियां भी अपनी समृद्ध लोक संस्कृति से परिचित हो सकेंगी।
ग्राम आड़ेगांव कला का यह आयोजन क्षेत्र में लोक संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल माना जा रहा है, जिसकी ग्रामीणों और लोककला प्रेमियों ने सराहना की।







