अरे रे व्यवस्था! ठेले पर बैठकर हक लेने निकली 70 साल की बुजुर्ग, छह महीने भूखे पेट ने पूछे कई सवाल

संवाददाता राकेश पटेल इक्का
नर्मदापुरम।
कभी-कभी एक तस्वीर पूरी व्यवस्था पर भारी पड़ जाती है। नर्मदापुरम के ग्वालटोली संजयनगर, वार्ड नंबर 33 में जो दृश्य सामने आया, वह किसी भी संवेदनशील समाज को शर्मसार करने के लिए काफी है।
70 वर्षीय जानकी बाई रैकवार—कमजोर शरीर, कांपते हाथ और सूनी आंखें—अपने हक के लिए ठेले पर बैठकर कलेक्ट्रेट पहुंचने को मजबूर हुईं।
कसूर सिर्फ इतना था… आधार अधूरा था
जानकी बाई के पास न बेटा है, न बहू, न कोई सहारा। बूढ़े पैरों में इतनी ताकत भी नहीं कि कुछ दूर चल सकें। जैसे-तैसे सरकारी राशन से जिंदगी चल रही थी।
फिर एक दिन राशन दुकान से जवाब मिला—
“पहले आधार ठीक कराओ, फिर अनाज मिलेगा।”
बस यहीं से शुरू हुआ भूख और बेबसी का सिलसिला।
छह महीने। पूरे छह महीने।
कभी पड़ोस से उधार, कभी खाली पेट… और कई बार सिर्फ पानी पीकर रात काटी गई।
जो चल नहीं सकती, वो दफ्तर कैसे जाए?
ये सवाल किसी फाइल में दर्ज नहीं था।
न कोई कर्मचारी आया, न कोई योजना पहुंची।
जानकी बाई घर में बैठी रहीं—
पेट सूखता गया, उम्मीद भी।
इंसानियत अभी जिंदा है…
इसी मोहल्ले में रहने वाला जितेंद्र चांदानी, जो खुद ठेला चलाकर रोजी कमाता है, ये सब देख रहा था।
आखिर एक दिन उसने कहा—
“जब कोई नहीं है, तो मैं हूं।”
उसने काम छोड़ा, जानकी बाई को अपने ठेले पर बैठाया और कलेक्ट्रेट की ओर निकल पड़ा।
रास्ते भर लोग देखते रहे—कुछ ने नजरें फेर लीं, कुछ चुप रहे।
लेकिन किसी ने ये नहीं पूछा कि ऐसी नौबत क्यों आई?
दफ्तर में भी इंतजाम नहीं
कलेक्ट्रेट पहुंचने पर भी कोई सुविधा नहीं थी।
तब आधार केंद्र के कर्मचारी रितेश चौरे आगे आए।
उन्होंने जानकी बाई को गोद में उठाया, बैठाया और कागजी प्रक्रिया पूरी करवाई।
जब उंगली का निशान लगा और आधार अपडेट हुआ,
तो जानकी बाई की आंखों से आंसू बह निकले।
हाथ जुड़े थे… आवाज कांप रही थी—
“अब शायद पेट भर जाएगा।”
पर सवाल अब भी जिंदा हैं
ये कोई बहादुरी की कहानी नहीं है।
ये व्यवस्था की असफलता की कहानी है।
- क्या हर बुजुर्ग को ऐसे ही घसीटकर लाना पड़ेगा?
- क्या दफ्तर तभी पसीजेंगे जब गरीब खुद टूटकर सामने आएगा?
- और अगर रास्ते में कोई जितेंद्र न मिले… तो?
आज जानकी बाई बच गईं।
लेकिन ये सवाल आज भी सड़क पर पड़े हैं—
जवाब का इंतजार करते हुए।







