तहसील में कलम चली, किसान फँसा — अधिकारी बोले, “सब दस्तूर है जी!”
सोहागपुर तहसील में नामांतरण प्रकरण से उठा विवाद — बिना वारिसों की मौजूदगी के आदेश जारी, ग्रामीण बोले “कागज पर न्याय, जमीन पर अन्याय”

सोहागपुर (जनता एक्सप्रेस लाइव)। गांव में इन दिनों तहसील दफ्तर की चर्चा हर चौपाल पर हो रही है। लोग कहते हैं —
“यहाँ जमीन पर नाम लिखवाना नहीं, हक समझाना मुश्किल हो गया है।”
मामला है नर्मदीबाई पति जमनालाल पटेल के नामांतरण का, जो अब तहसील की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर रहा है।
जमनालाल पटेल के निधन के बाद नामांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि यह आदेश बिना वारिसों की मौजूदगी और बिना बंटवारे की कार्यवाही के जारी किया गया।
ग्रामीण बोले — “नाम तो चढ़ा, पर न्याय कहाँ गया?”
गांव के लोगों ने बताया कि कई वारिसों के नाम दर्ज ही नहीं हैं, कुछ को तो पता तक नहीं कि उनका हिस्सा किसके नाम चला गया।
गांव के बुजुर्गों ने व्यंग्य में कहा —
“अब तो तहसील में भगवान भी बिना रिश्वत के फाइल नहीं देखता, और पटवारी की लिखावट ऐसी कि किसान समझे या ज्योतिषी?”
अफसरों की सफाई — “सब नियम से हुआ”
जब तहसील अधिकारियों से पूछा गया कि बिना वारिसों की उपस्थिति के आदेश कैसे पास हुआ, तो जवाब मिला —
“साहब, सब नियम से हुआ है, कोई गड़बड़ी नहीं।”
लेकिन गांव वालों का कहना है कि कागजों पर तो सब ठीक है, पर जमीन पर न्याय की फसल सूख चुकी है।
गांव की आवाज़ — “फाइल चलती है, इंसाफ रुकता है”
ग्रामीणों ने तंज कसते हुए कहा —
“किसान की जमीन अब तहसील की डायरी में फँस गई है।
अफसर का मूड अच्छा हो तो नाम चढ़े, वरना फाइल धूप में सूखती रहती है।”
पत्रकार की कलम से — सच्चाई की स्याही
यह मामला केवल एक नामांतरण का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही का प्रतीक है।
जहाँ सरकारी कलम से जनता की किस्मत लिखी जाती है, वहीं अक्सर स्याही सूखने से पहले न्याय सूख जाता है।
गांव की जनता अब एक ही बात कह रही है —
“नामांतरण बाद में करना, पहले इंसाफ का नाम चढ़ाओ!”







