8 साल का मासूम गिरवी… मां की पुकार से भी न पसीजा पत्थरदिल ठेकेदार
6 साल तक गुलामी करता रहा बच्चा, आंखों में आंसू लिए तड़पती रही मां, आखिरकार संस्था और पुलिस ने दिलाई आज़ादी

संवाददाता शैलेंद्र गुप्ता बैतूल
बैतूल। कभी सुना है कि कोई अपने जिगर के टुकड़े को किसी के पास गिरवी रखे?
मध्यप्रदेश के बैतूल में यह दर्दनाक सच्चाई सामने आई है। एक मां को मजबूरी में अपना 8 साल का बेटा ठेकेदार के पास छोड़ना पड़ा। मां गिड़गिड़ाती रही, आंसू बहाती रही… पर पत्थरदिल ठेकेदार का मन नहीं पसीजा।
कर्ज़ बना काल
वर्ष 2019 में सरिता और उसके पति ने घर चलाने के लिए ठेकेदार रूपेश शर्मा से 50 हजार रुपए कर्ज़ लिया। पति-पत्नी दिन-रात खपते रहे और किसी तरह रकम जुटाकर लौटा दी। लेकिन जब वे पैसे लौटाने पहुंचे तो ठेकेदार ने ब्याज के नाम पर 60 हजार और मांगे। गरीब दंपत्ति के पास इतने पैसे कहां से आते?

ठेकेदार ने बेरहमी से कह दिया—“पैसे नहीं दे सकते तो बेटे को गिरवी रखो, उसे यहीं छोड़ना पड़ेगा।”
बेबस मां-बाप ने आंसुओं में डूबकर अपने 8 साल के मासूम को ठेकेदार के पास छोड़ दिया।
गुलामी में बीते बचपन के साल
बचपन, जो खेलने-कूदने और पढ़ाई का समय होता है, वह मासूम खेतों में जानवर चराता रहा, मजदूरी करता रहा।
मां बार-बार बेटे को छुड़ाने के लिए ठेकेदार से गिड़गिड़ाई, पर हर बार उसका दिल और पत्थर होता गया।

रातों को मां अपनी आंखों में आंसू लिए बेटे की तस्वीर तक निहारती रही, लेकिन कुछ कर पाने की ताकत नहीं थी।
6 साल बाद मिली आज़ादी
आखिरकार जन साहस संस्था तक यह दर्दनाक खबर पहुंची। संस्था ने पुलिस और प्रशासन के साथ मिलकर 12 सितंबर 2025 को छापा मारा और बच्चे को ठेकेदार के चंगुल से मुक्त कराया।
आजाद होते ही मासूम की आंखें मां को ढूंढने लगीं… वह दौड़कर गले लगना चाहता था, लेकिन कानूनी पेंच ने उसकी राह रोक दी।
कानूनी अड़चनें
बाल कल्याण समिति (CWC) ने बच्चे को छिंदवाड़ा के बालगृह भेज दिया है। मां-बाप उसे वापस पाना चाहते हैं, पर उनके पास पहचान से जुड़े कागज़ नहीं हैं।
जन साहस की कार्यकर्ता पल्लवी ठकराकर ने बताया—“हमने बच्चे को छुड़ा तो लिया, लेकिन दस्तावेज़ के अभाव में अभी भी मां-बाप को उसका इंतज़ार करना पड़ रहा है।”

CWC बैतूल के अध्यक्ष अभिषेक जैन ने कहा कि माता-पिता को दस्तावेजों से अपना संबंध साबित करना होगा। तभी समिति लिखित आदेश देकर बच्चे को उनके सुपुर्द कर सकेगी।
सवाल जो उठ खड़े हुए
- क्या गरीबी इतनी बड़ी मजबूरी है कि मां-बाप को अपने बच्चे तक को गिरवी रखना पड़ जाए?
- क्या ब्याजखोरी और बंधुआ प्रथा खत्म होने का दावा सिर्फ कागज़ों तक सीमित है?
- 6 साल गुलामी के बाद आज़ाद हुए उस मासूम के दिल पर जो जख्म हैं, क्या वे कभी भर पाएंगे?
भावनात्मक झलकियाँ :
- कर्ज़ के बोझ तले बेटे को ठेकेदार के पास गिरवी रखना पड़ा
- मां की आंखों से बहते आंसू भी नहीं पिघला सके ठेकेदार का दिल
- 6 साल गुलामी करने के बाद संस्था व पुलिस ने दिलाई आज़ादी
- दस्तावेज़ न होने से अब भी मां-बाप अपने बेटे के लिए तरस रहे हैं







