मध्य प्रदेश

निलंबित डिप्टी कलेक्टर असवनराम चिरामन मामले में बड़ा मोड़, अब शुरू होंगे गवाहों के बयान

महिला कर्मचारियों की शिकायतों से शुरू हुआ मामला अब पहुंचा गवाहों की पेशी तक, निलंबित डिप्टी कलेक्टर असवनराम चिरामन की जांच ने बढ़ाई हलचल, विभागीय जांच में अब शुरू होंगे बयान, वर्तमान एसडीएम प्रियंका भलावी को शासन साक्षी के रूप में बुलाया गया

संवाददाता राकेश पटेल इक्का

नर्मदापुरम | सरकारी दफ्तरों में कुर्सियां सिर्फ आदेश देने के लिए नहीं होतीं, वे मर्यादा, विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक भी मानी जाती हैं। लेकिन जब उसी कुर्सी पर बैठा अधिकारी सवालों के घेरे में आ जाए, तो मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, पूरा सिस्टम कठघरे में खड़ा हो जाता है।

सोहागपुर के तत्कालीन एसडीएम और वर्तमान में निलंबित डिप्टी कलेक्टर असवनराम चिरामन से जुड़ा मामला अब ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां प्रशासनिक गलियारों में फाइलों से ज्यादा चर्चाएं चल रही हैं। महिला कर्मचारियों की शिकायतों से शुरू हुआ यह मामला अब विभागीय जांच के उस संवेदनशील चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां शासन साक्षियों के बयान दर्ज किए जाएंगे।

अब गवाहों की बारी… और नजरें 11 मई पर

कलेक्टर कार्यालय नर्मदापुरम से जारी आदेश के मुताबिक, अपर कलेक्टर एवं विभागीय जांच अधिकारी अनिल कुमार जैन ने वर्तमान एसडीएम सोहागपुर प्रियंका भलावी को 11 मई 2026 को सुबह 11 बजे साक्ष्य हेतु उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।

प्रियंका भलावी सिर्फ एसडीएम नहीं हैं, बल्कि जिला स्तरीय जांच समिति की सदस्य भी रही हैं। ऐसे में उनका बयान इस पूरी जांच में बेहद अहम माना जा रहा है।

आदेश में स्पष्ट उल्लेख है कि मध्यप्रदेश सिविल सेवा वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील नियम 1966 के नियम 14 के तहत असवनराम चिरामन के खिलाफ विभागीय जांच जारी है और आरोप पत्र के समर्थन में तैयार साक्ष्य सूची में प्रियंका भलावी को शासन साक्षी बनाया गया है।

आखिर ऐसा क्या हुआ था कि एक एसडीएम को निलंबित करना पड़ा?

यह मामला पहली बार तब सुर्खियों में आया था, जब मार्च 2025 में संभागायुक्त कृष्णगोपाल तिवारी ने असवनराम चिरामन को निलंबित कर दिया था।

उस दौरान मीडिया से चर्चा में संभागायुक्त का एक बयान बेहद चर्चित हुआ था। उन्होंने कहा था—

“जांच में कुछ ऐसी बातें सामने आई हैं जिन्हें सभ्य समाज स्वीकार नहीं करेगा।”

बस, इसी एक लाइन ने पूरे प्रशासनिक सिस्टम में हलचल मचा दी थी।

महिला कर्मचारियों ने लगाए थे गंभीर आरोप

सूत्रों के मुताबिक शिकायतें सिर्फ कार्यशैली तक सीमित नहीं थीं। महिला कर्मचारियों ने कार्यालयीन माहौल, संवाद शैली और कथित अभद्र व्यवहार को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

बताया जाता है कि कई कर्मचारियों ने कार्यस्थल के वातावरण को लेकर असहजता जाहिर की थी। जिला स्तर पर हुई जांच के बाद मामला संभागीय स्तर तक पहुंचा और फिर कार्रवाई हुई।

हालांकि प्रशासन की ओर से अब तक जांच के बिंदुओं को सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन जिस तरह से विभागीय जांच आगे बढ़ रही है, उससे साफ है कि मामला बेहद गंभीर माना जा रहा है।

क्या पहले भी दबाए जाते रहे विवाद?

इस पूरे मामले के बीच प्रशासनिक गलियारों में पुराने विवाद भी चर्चा में हैं। कुछ कर्मचारियों का दावा है कि कार्यशैली को लेकर पहले भी असंतोष सामने आता रहा था, लेकिन तब मामलों को अंदरूनी स्तर पर शांत करा दिया गया।

इन दावों की आधिकारिक पुष्टि भले न हुई हो, लेकिन अब जब विभागीय जांच में गवाहों को बुलाया जा रहा है, तो कई पुराने सवाल फिर सतह पर आने लगे हैं।

अब आगे क्या?

सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों में अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को भी बयान के लिए बुलाया जा सकता है। शासन साक्षियों के बयान दर्ज होने के बाद जांच रिपोर्ट का अगला चरण तय होगा।

फिलहाल पूरा प्रशासनिक अमला इस बात पर नजर बनाए हुए है कि आखिर जांच फाइलों में ऐसा क्या दर्ज है, जिसने एक वरिष्ठ अधिकारी को निलंबन से लेकर विभागीय जांच और अब गवाहों की पेशी तक पहुंचा दिया।

सबसे बड़ा सवाल…

क्या यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की कार्यशैली तक सीमित है?
या फिर यह उन दफ्तरों की सच्चाई भी उजागर कर रहा है, जहां महिला कर्मचारियों की आवाज अक्सर फाइलों के नीचे दब जाती है?

फिलहाल अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है।
लेकिन इतना तय है कि सोहागपुर का यह मामला आने वाले समय में प्रशासनिक कार्यशैली, कार्यस्थल की गरिमा और महिला कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर बड़ी बहस जरूर खड़ी करेगा।

 

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