लाइफस्टाइल

मोबाइल के चक्कर में खो गया बचपन

गिल्ली-डंडा, कंचे और कबड्डी सब हार गए, मोबाइल जीत गया... बचपन हार गया

बचपन! एक समय था जब गांव की गलियां बच्चों की आवाज़ों से गुलजार रहती थीं। सुबह से लेकर शाम तक खेलों की धूम मची रहती थी। कोई गिल्ली-डंडा खेल रहा होता था, कोई कंचों में निशाना साध रहा होता था। कहीं कबड्डी के मैदान में धूल उड़ती थी तो कहीं क्रिकेट की एक गेंद और एक बल्ले के लिए पूरा मोहल्ला जुट जाता था।

पतंग उड़ाने की प्रतियोगिता होती थी, लुका-छिपी में बच्चों की टोलियां गलियों में दौड़ती थीं। उस दौर में दोस्ती मोबाइल नंबरों से नहीं, बल्कि साथ खेलते-खेलते बनती थी।

लेकिन आज समय बदल गया है।

अब न गलियों में वह शोर सुनाई देता है और न मैदानों में वह उत्साह दिखाई देता है। जिन हाथों में कभी कंचे, गिल्ली-डंडा और पतंग की डोर होती थी, आज उन्हीं हाथों में मोबाइल फोन है। बच्चे अब मैदानों में कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा नजर आते हैं।

पहले शाम होते ही बच्चे घर से बाहर खेलने निकल पड़ते थे। माता-पिता को उन्हें घर बुलाने के लिए कई बार आवाज लगानी पड़ती थी। आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। अब बच्चे कमरे में बैठकर मोबाइल गेम खेलते हैं और माता-पिता उन्हें मोबाइल छोड़ने के लिए समझाते रहते हैं।

मोबाइल निश्चित रूप से आधुनिक युग की एक बड़ी आवश्यकता है। इसके माध्यम से ज्ञान, शिक्षा और दुनिया भर की जानकारी कुछ ही सेकंड में मिल जाती है। पढ़ाई, व्यवसाय और संचार के क्षेत्र में इसकी उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता।

समस्या मोबाइल नहीं है, समस्या उसका अत्यधिक उपयोग है।

जब मोबाइल जरूरत से ज्यादा जीवन का हिस्सा बन जाता है, तब वह सुविधा नहीं बल्कि आदत बन जाता है। आज कई लोग सुबह आंख खुलते ही सबसे पहले मोबाइल देखते हैं और रात को सोने से पहले आखिरी बार भी मोबाइल ही देखते हैं। खाना खाते समय, सफर करते समय, दोस्तों के बीच बैठते समय और यहां तक कि परिवार के साथ रहते हुए भी मोबाइल साथ रहता है।

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इस बदलाव का असर बच्चों के बचपन पर पड़ रहा है। खेल के मैदान खाली हो रहे हैं और मोबाइल गेम्स की दुनिया आबाद हो रही है। बच्चों की शारीरिक गतिविधियां कम होती जा रही हैं और स्क्रीन टाइम लगातार बढ़ रहा है।

कभी-कभी मन में सवाल उठता है कि आखिर वह बचपन कहां चला गया?

वह कंचों की खनक, वह पतंगों की उड़ान, वह कबड्डी की पुकार, वह लुका-छिपी का रोमांच, वह दोस्तों की टोली और वह बेफिक्र हंसी—सब धीरे-धीरे यादों में सिमटते जा रहे हैं।

आज भी जब किसी मैदान में बच्चों को पारंपरिक खेल खेलते देखता हूं तो मन खुश हो जाता है। लगता है कि बचपन अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बस उसे फिर से जगाने की जरूरत है।

मैं स्वयं मोबाइल का उपयोग मुख्य रूप से खबरें देने, जानकारी पहुंचाने और समाज से जुड़े रहने के लिए करता हूं। क्योंकि मैं उस बचपन को नहीं भूल पाया हूं, जो कभी गलियों और मैदानों में दौड़ता था और आज मोबाइल की स्क्रीन में कहीं खोता जा रहा है।

— बचपन को बचाइए, बच्चों को मैदानों से जोड़िए, क्योंकि मोबाइल दोबारा खरीदा जा सकता है, लेकिन खोया हुआ बचपन कभी वापस नहीं आता।

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!