मध्य प्रदेश

गाडरवारा गोटीटोरिया कोल खदान पर उठे पारदर्शिता के सवाल

आरटीआई में कई जानकारियां रोकी गईं, पर्यावरणीय दस्तावेज सार्वजनिक न करने पर बढ़ा विवाद

नरसिंहपुर। जिले की गोटीटोरिया (ईस्ट एवं वेस्ट) कोल खदान को लेकर पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी में कोयला मंत्रालय द्वारा कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और सूचनाएं साझा करने से इंकार किए जाने के बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया है।

आरटीआई कार्यकर्ता हर्षित राय द्वारा दायर आवेदन में गोटीटोरिया (ईस्ट एवं वेस्ट) कोल ब्लॉक के आवंटन, शर्तों, अवधि, पर्यावरणीय मंजूरी और माइनिंग प्लान से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी गई थी। आवेदन संख्या MCOAL/R/E/26/00085 के जवाब में कोयला मंत्रालय ने बताया कि यह कोल ब्लॉक M/s Boulder Stone Mart Pvt. Ltd. को कोल माइंस (विशेष प्रावधान) अधिनियम 2015 के तहत आवंटित किया गया है। मंत्रालय के अनुसार कंपनी के साथ Coal Mine Development and Production Agreement (CMDPA) 11 जनवरी 2021 को निष्पादित हुआ था।

हालांकि, जब आवंटन की विस्तृत शर्तें, वित्तीय प्रावधान, कीमत और वाणिज्यिक समझौतों की जानकारी मांगी गई तो विभाग ने इन्हें साझा करने से मना कर दिया। मंत्रालय ने इसके पीछे आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(d) और धारा 11 का हवाला देते हुए कहा कि यह जानकारी “तृतीय पक्ष की वाणिज्यिक गोपनीयता” से जुड़ी है।

पर्यावरणीय जानकारी भी नहीं दी गई

आरटीआई में खदान के कुल क्षेत्रफल और पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़े दस्तावेज भी मांगे गए थे। विभाग ने केवल इतना बताया कि स्वीकृत माइनिंग प्लान के तहत करीब 249.246 हेक्टेयर क्षेत्र उत्पादन के लिए निर्धारित है। लेकिन माइनिंग प्लान की पूरी कॉपी, पर्यावरणीय प्रभाव रिपोर्ट और अन्य क्लियरेंस दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।

इस पर आरटीआई कार्यकर्ता हर्षित राय ने सवाल उठाते हुए कहा कि खनन परियोजनाएं सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ी होती हैं और इनका सीधा असर पर्यावरण, रोजगार और सरकारी राजस्व पर पड़ता है। ऐसे में पर्यावरणीय दस्तावेज और माइनिंग प्लान जैसी जानकारियां जनता से छुपाना पारदर्शिता के खिलाफ माना जा सकता है।

स्थानीय स्तर पर भी बढ़ी चर्चा

गोटीटोरिया कोल ब्लॉक से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक न होने के बाद स्थानीय स्तर पर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े खनन प्रोजेक्ट्स से जुड़ी जानकारियों को गोपनीय रखना जनहित के विपरीत हो सकता है। उनका मानना है कि इससे पर्यावरणीय प्रभावों और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े होते हैं।

वहीं विभागीय सूत्रों का कहना है कि कुछ दस्तावेज वाणिज्यिक प्रतिस्पर्धा और कंपनी से जुड़े संवेदनशील पहलुओं के कारण सार्वजनिक नहीं किए जा सकते।

पारदर्शिता बनाम गोपनीयता की बहस तेज

यह मामला अब सूचना के अधिकार कानून की सीमाओं और सरकारी पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या खनन जैसे सार्वजनिक प्रभाव वाले क्षेत्रों में “वाणिज्यिक गोपनीयता” को प्राथमिकता दी जानी चाहिए या फिर जनता के हित में अधिकतम जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है।

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