सोनतलाई जंगल में मादा बाघ की मौत, वन्य जीवन के संतुलन पर गहरा आघात
इटारसी परिक्षेत्र में मृत पाई गई बाघिन, जंगल की नाजुक पारिस्थितिकी पर उठे गंभीर सवाल

संवाददाता राकेश पटेल इक्का
सोनतलाई/इटारसी (नर्मदापुरम)।
सोनतलाई क्षेत्र के घने जंगलों से बुधवार को एक बेहद पीड़ादायक और चिंताजनक खबर सामने आई, जब दो दिनों से निगरानी में रखी गई एक मादा बाघ मृत अवस्था में पाई गई। इस घटना ने न केवल वन विभाग बल्कि पर्यावरण प्रेमियों और संरक्षणकर्मियों को गहरे शोक में डुबो दिया है। बाघिन की मृत्यु ने जंगल के संतुलन और वन्य जीवन की असुरक्षा को एक बार फिर उजागर कर दिया।
वन विभाग की निगरानी के बीच हुई मौत
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मादा बाघ पिछले दो दिनों से उसी स्थान पर संदिग्ध अवस्था में देखी जा रही थी। बुधवार को जब वन अमले ने क्षेत्र का निरीक्षण किया, तो बाघ मृत मिली। इसके बाद वनमंडल नर्मदापुरम, सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व, एनटीसीए द्वारा नियुक्त चिकित्सक, डॉग स्क्वाड, तहसीलदार इटारसी एवं ग्राम पंचायत रानीपुर के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में विधिवत पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी की गई।
प्रारंभिक जांच में पेट संक्रमण की आशंका
पोस्टमार्टम के प्रारंभिक निष्कर्षों के अनुसार, बाघ की मृत्यु का संभावित कारण पेट में गंभीर संक्रमण बताया जा रहा है। हालांकि अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि अंतिम निष्कर्ष विस्तृत जांच रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएंगे। फिलहाल अवैध शिकार या हिंसा के कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं, फिर भी जंगल की नाजुक स्थिति और वन्य जीवों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं उभर कर सामने आई हैं।
डॉग स्क्वाड की तलाशी, रहस्य अब भी बरकरार
मृत्यु के बाद डॉग स्क्वाड और वन अमले द्वारा आसपास के क्षेत्र में व्यापक सर्चिंग की गई, लेकिन किसी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि के ठोस प्रमाण नहीं मिले। इसके बावजूद यह घटना जंगल में रहने वाले जीवों की असहायता और प्रकृति की मौन पीड़ा को उजागर करती है।
अधिकारियों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार
सभी वैधानिक प्रक्रियाओं के बाद अधिकारियों की उपस्थिति में बाघिन का अंतिम संस्कार किया गया। लेकिन जंगल की खामोशी में अब वह गर्जना नहीं रही, जो उसके अस्तित्व की पहचान थी। यह मृत्यु केवल एक वन्य जीव की नहीं, बल्कि जंगल की पारिस्थितिकी व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।
वन्य जीवन संरक्षण पर गंभीर सवाल
पर्यावरणविदों और वन्य जीवन से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं यह बताती हैं कि जंगल का संतुलन अत्यंत नाजुक हो चुका है। समय रहते संरक्षण, सतर्क निगरानी और संसाधनों की मजबूती नहीं की गई, तो आने वाले समय में वन्य जीवन पर संकट और गहरा सकता है।
एक पत्रकार की संवेदनशील दृष्टि
जंगल के बीच रहकर प्रकृति की नब्ज़ समझने वाले पत्रकारों के लिए यह घटना मात्र एक खबर नहीं, बल्कि वन्य जीवन का व्यक्तिगत मातम है। यह जंगल की वह खामोश चीख है, जिसे सुनना और समझना अब समाज, प्रशासन और हर नागरिक की जिम्मेदारी बन चुका है।







