इटारसी में विकास के नाम पर सख्ती: डोलरिया रोड पर मजार हटाकर खोला गया रास्ता, प्रशासन की कार्यशैली पर उठे सवाल
रोड चौड़ीकरण में बाधा बताकर हटाई गई मजार, बुलडोजर कार्रवाई से क्षेत्र में बना तनाव का माहौल

संवाददाता राकेश पटेल इक्का
इटारसी। शहर में रोड चौड़ीकरण की आड़ में एक बार फिर प्रशासन की सख्त और एकतरफा कार्रवाई देखने को मिली। ग्वाल बाबा (नाला मोहल्ला) क्षेत्र में डोलरिया रोड पर स्थित वर्षों पुरानी मजार को आज हटा दिया गया। प्रशासन इसे “आपसी सहमति” का उदाहरण बता रहा है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इस कार्रवाई को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं और सवाल उठ रहे हैं।
बताया गया कि यह मजार लंबे समय से सड़क चौड़ीकरण में बाधा बन रही थी। इसी को आधार बनाकर नगर प्रशासन ने पुलिस बल की मौजूदगी में कार्रवाई की। मौके पर बुलडोजर लाकर न सिर्फ मजार हटाई गई, बल्कि आसपास के अन्य अतिक्रमणों को भी साफ कर दिया गया। कार्रवाई के दौरान पूरे इलाके में भारी पुलिस बल तैनात रहा, जिससे साफ जाहिर हुआ कि प्रशासन किसी भी विरोध की आशंका से पहले ही चौकन्ना था।
विधायक डॉ. सीता शरण शर्मा ने इसे विकास की दिशा में जरूरी कदम बताया और कहा कि यह सब आपसी समन्वय से हुआ है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या विकास की कीमत हमेशा ऐसे धार्मिक स्थलों के विस्थापन से ही चुकाई जाएगी? स्थानीय लोग यह भी कह रहे हैं कि सहमति की बात कागजों तक सीमित थी, जमीन पर स्थिति उतनी सरल नहीं थी।
नगर पालिका अध्यक्ष पंकज चौरे ने दावा किया कि इस मार्ग से करीब 30 हजार ग्रामीणों को राहत मिलेगी और यातायात सुगम होगा। लेकिन दूसरी ओर यह भी चर्चा है कि सड़क चौड़ीकरण की योजना पहले से थी, फिर वर्षों तक यह बाधा क्यों बनी रही और अब अचानक बुलडोजर क्यों चलाया गया?
प्रशासन यह बताने में सफल नहीं हो पाया कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए कोई ठोस नीति बनाई गई है या नहीं। पहले रेलवे स्टेशन के सामने हनुमान मंदिर का विस्थापन और अब मजार हटाने की कार्रवाई—इन घटनाओं ने यह संदेश जरूर दिया है कि विकास योजनाओं की कमजोर प्लानिंग का खामियाजा बार-बार आम लोगों और आस्था से जुड़े स्थलों को भुगतना पड़ रहा है।
फिलहाल सड़क चौड़ीकरण का रास्ता तो साफ हो गया है, लेकिन प्रशासन की कार्यप्रणाली, समय पर निर्णय न लेने और आखिरी वक्त पर बुलडोजर चलाने की नीति ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विकास जरूरी है, मगर क्या उसे हर बार विवाद और असंतोष के साए में ही आगे बढ़ना होगा—यह सवाल इटारसी की गलियों में अब खुलकर पूछा जा रहा है।







