बांसखेड़ा में विकास के दावों पर सवाल: 50 साल बाद भी श्मशान घाट तक नहीं पहुंचा रास्ता, बारिश में अंतिम यात्रा बनी मुसीबत
बारिश में कीचड़ और जलभराव के बीच निकली अंतिम यात्रा, जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

सांईखेड़ा/बांसखेड़ा। सोशल मीडिया पर इन दिनों 1980 का दौर ट्रेंड कर रहा है। लेकिन जनपद पंचायत सांईखेड़ा के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत बांसखेड़ा की तस्वीर देखकर ऐसा लगता है कि यहां 1980 का दौर केवल सोशल मीडिया पर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत में भी दिखाई दे रहा है।
मामला किसी बड़े विकास प्रोजेक्ट या आधुनिक सुविधा का नहीं, बल्कि श्मशान घाट तक पहुंचने वाले बुनियादी रास्ते का है। ग्रामीणों के मुताबिक बारिश के दिनों में श्मशान घाट तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता है। कीचड़ और जलभराव के कारण अंतिम यात्रा में शामिल लोगों को भी परेशानी उठानी पड़ती है।
पूर्व जनपद अध्यक्ष के पति की अंतिम यात्रा में सामने आई समस्या
यह मामला उस समय और चर्चा में आया, जब ग्राम पंचायत बांसखेड़ा निवासी एवं पूर्व जनपद पंचायत अध्यक्ष के पति के निधन के बाद उनकी अंतिम यात्रा श्मशान घाट के लिए निकली।
बारिश के कारण रास्ते पर कीचड़ और जलभराव की स्थिति बनी हुई थी। ऐसे में अंतिम यात्रा में शामिल लोगों को कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। खासतौर पर बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और शारीरिक रूप से कमजोर लोगों के लिए रास्ता परेशानी का कारण बना।
यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि यदि गांव में श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए भी बरसात में सुगम रास्ता उपलब्ध नहीं है, तो विकास की प्राथमिकताओं में इस बुनियादी सुविधा का स्थान आखिर कहां है?
50 साल में श्मशान मार्ग क्यों नहीं बन पाया?
ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से श्मशान घाट तक पहुंच मार्ग की समस्या बनी हुई है। करीब पांच दशक के दौरान गांवों के विकास के लिए सड़क, बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर अनेक योजनाएं संचालित हुईं, लेकिन बांसखेड़ा में श्मशान घाट तक पहुंच मार्ग की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका।
यह केवल सड़क का सवाल नहीं है। यह मानवीय गरिमा, संवेदना और ग्रामीणों की बुनियादी सुविधा से जुड़ा विषय है।
किसी परिवार के लिए अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देना पहले ही बेहद भावनात्मक और कठिन समय होता है। ऐसे में यदि अंतिम यात्रा के दौरान खराब रास्ते और कीचड़ से जूझना पड़े, तो व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पूर्व जनपद अध्यक्ष के कार्यकाल को लेकर भी उठ रहे सवाल
बांसखेड़ा की स्थिति इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसी गांव की महिला जनप्रतिनिधि करीब पांच वर्ष तक जनपद पंचायत सांईखेड़ा की अध्यक्ष रही हैं।
ऐसे में ग्रामीणों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उनके कार्यकाल सहित पिछले वर्षों में श्मशान घाट तक पहुंच मार्ग के लिए क्या प्रयास किए गए?
- क्या मार्ग निर्माण के लिए पंचायत स्तर पर प्रस्ताव तैयार किया गया?
- यदि प्रस्ताव भेजा गया तो उस पर क्या कार्रवाई हुई?
- क्या इस कार्य के लिए राशि स्वीकृत हुई?
- यदि राशि स्वीकृत हुई तो उसका उपयोग किस कार्य में किया गया?
- यदि मार्ग का निर्माण हुआ था, तो वर्तमान में उसकी स्थिति इतनी खराब क्यों है?
इन सवालों के जवाब पंचायत के आधिकारिक रिकॉर्ड और संबंधित विभागीय दस्तावेजों से ही स्पष्ट हो सकते हैं।
‘नाम मात्र की अध्यक्ष’ के आरोपों की भी हो जांच
स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों द्वारा यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि पूर्व जनपद अध्यक्ष केवल नाममात्र की अध्यक्ष थीं और वास्तविक निर्णय किसी अन्य व्यक्ति के प्रभाव में लिए जाते थे।
हालांकि, यह आरोप है, प्रमाणित तथ्य नहीं। इसलिए इसकी पुष्टि बिना दस्तावेजी या आधिकारिक साक्ष्य के नहीं की जा सकती। यदि ऐसे आरोप सामने आए हैं तो संबंधित बैठकों के रिकॉर्ड, प्रस्ताव, निर्णय प्रक्रिया और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर ही स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
लेकिन इस आरोप से एक अहम सवाल फिर भी बना रहता है—बांसखेड़ा के सरपंच, सचिव और पूर्व जनप्रतिनिधियों ने श्मशान घाट तक पहुंच मार्ग के लिए पिछले वर्षों में क्या प्रयास किए?
सरपंच-सचिव से लेकर अधिकारियों तक जवाबदेही जरूरी
ग्राम पंचायत व्यवस्था में स्थानीय जरूरतों की पहचान कर उनके लिए प्रस्ताव तैयार करना और संबंधित स्तर पर उन्हें आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
इसलिए प्रशासन को यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए कि बांसखेड़ा के श्मशान घाट तक पहुंच मार्ग को लेकर—
कितने प्रस्ताव तैयार हुए?
कब-कब जनपद पंचायत को भेजे गए?
किसी योजना के तहत राशि स्वीकृत हुई या नहीं?
यदि राशि मिली तो उसका उपयोग कहां किया गया?
संबंधित अधिकारियों ने स्थल निरीक्षण कब किया?
पंचायत के रिकॉर्ड में इस मार्ग को लेकर क्या कार्ययोजना दर्ज है?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि समस्या के पीछे प्रशासनिक लापरवाही है, बजट की कमी है, प्रस्ताव लंबित हैं या कोई अन्य कारण।
भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, जांच का विषय; खराब रास्ता वास्तविक समस्या
ग्राम पंचायत में भ्रष्टाचार हुआ है या नहीं, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकता है। बिना प्रमाण किसी व्यक्ति अथवा पंचायत पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
लेकिन दूसरी ओर, श्मशान घाट तक पहुंच मार्ग की खराब स्थिति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बारिश में यदि अंतिम यात्रा को कीचड़ और जलभराव से होकर गुजरना पड़े, तो यह अपने आप में प्रशासन और पंचायत व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल है।
क्या जिम्मेदारों ने कभी बारिश में रास्ते की स्थिति देखी?
सरकारी कार्यालयों में विकास की फाइलें कागज पर आगे बढ़ती हैं, लेकिन गांव की वास्तविक तस्वीर बारिश में सामने आती है।
क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी बारिश के दौरान श्मशान घाट तक पहुंचने वाले रास्ते का निरीक्षण किया?
क्या कभी यह देखा गया कि बुजुर्ग अंतिम यात्रा में किस तरह पहुंचते हैं? महिलाओं और बच्चों को किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है? और सबसे महत्वपूर्ण—किसी शव को श्मशान घाट तक ले जाते समय परिवार और ग्रामीणों को किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है?
इन सवालों का जवाब केवल कागजी रिकॉर्ड से नहीं, बल्कि स्थल निरीक्षण से ही मिल सकता है।
प्रशासन करे स्थल निरीक्षण, रिकॉर्ड की हो जांच
इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप से अधिक जरूरी है कि जनपद पंचायत सांईखेड़ा और संबंधित विभाग के अधिकारी बांसखेड़ा के श्मशान घाट तक पहुंच मार्ग का स्थल निरीक्षण करें।
साथ ही पिछले वर्षों के पंचायत प्रस्ताव, स्वीकृत राशि, निर्माण कार्य, भुगतान और संबंधित अभिलेखों की जांच की जाए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि आखिर इतने लंबे समय से यह बुनियादी सुविधा क्यों नहीं बन पाई।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक सड़क का नहीं है।
सवाल उस व्यवस्था का है, जहां विकास की योजनाओं और उपलब्धियों के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन किसी परिवार को अपने दिवंगत परिजन की अंतिम यात्रा के लिए भी बारिश में कीचड़ भरे रास्ते से गुजरना पड़े।
बांसखेड़ा पूछ रहा है…
विकास की फाइलों में रास्ता बना या नहीं, यह बाद की बात है।
पहले यह बताइए—श्मशान घाट तक पहुंचने का पक्का और सुगम रास्ता जमीन पर कब बनेगा?







