मध्य प्रदेश

मध्यप्रदेश में पराली जलाने की समस्या पर 15 दिवसीय मेगा सर्वेक्षण पूरा, 15 दिसंबर को राष्ट्रीय विशेषज्ञों के सामने होगा निर्णायक प्रस्तुतीकरण

मध्यप्रदेश में पराली जलाने की समस्या पर कृषि वैज्ञानिकों का 15 दिवसीय सर्वेक्षण पूरा। 7 आयामों पर आधारित रिपोर्ट का निर्णायक प्रस्तुतीकरण 15 दिसंबर को विशेषज्ञों के समक्ष होगा।

भोपाल। मध्यप्रदेश में पराली जलाने की बढ़ती समस्या को वैज्ञानिक और नीतिगत समाधान देने के उद्देश्य से राज्यभर में 15 दिवसीय व्यापक सर्वेक्षण अभियान चलाया गया। भारत–इंडिया जोड़ो अभियान के अंतर्गत किए गए इस सर्वेक्षण में सतना, पन्ना और सिवनी जिलों के कई ग्रामीण इलाकों में किसानों की वास्तविक समस्याओं, कृषि पद्धतियों, जलवायु जोखिम और संसाधन उपलब्धता की गहन जांच की गई।

इस मेगा सर्वेक्षण का अंतिम और निर्णायक प्रस्तुतीकरण 15 दिसंबर 2025 को देश के प्रमुख जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और रिलायंस फाउंडेशन के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष मुंबई में किया जाएगा।

कृषि वैज्ञानिकों की विशेष टीम कर रही अध्ययन—पूसा विश्वविद्यालय से लेकर ग्रामोदय तक की सहभागिता

इस सर्वेक्षण का नेतृत्व डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुधानंद प्रसाद लाल द्वारा किया गया।
टीम में महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के पीएचडी शोधार्थी —

  • अक्षय सिंह
  • आदित्य सिंह
  • जैकी वर्मा

शामिल रहे। टीम ने 15 दिनों तक गांव-गांव जाकर किसानों से बातचीत की, खेतों की स्थिति देखी, तकनीकी उपकरणों का अवलोकन किया, और कृषि उत्पादन को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय कारकों का अध्ययन किया।

रिलायंस फाउंडेशन के जलवायु अनुकूल सूचकांक का परीक्षण—7 आयामों पर आधारित विस्तृत मूल्यांकन

सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य रिलायंस फाउंडेशन द्वारा विकसित “Climate Resilience Index” का परीक्षण और मानकीकरण करना था।

यह सूचकांक इन 7 मुख्य आयामों पर आधारित है—

  1. जलवायु परिवर्तन जागरूकता
  2. सामुदायिक तैयारी
  3. सामाजिक सामंजस्य
  4. कृषि उत्पादन और आधुनिक पद्धतियां
  5. जल संसाधन प्रबंधन
  6. उत्पादक नेटवर्क, विपणन व जोखिम प्रबंधन
  7. महिला सशक्तिकरण, आजीविका विविधता और खाद्य उपलब्धता

टीम ने प्रत्येक आयाम पर गांवों की स्थिति को विस्तार से समझा और डेटा संग्रह किया।

ग्रामीण वास्तविकता—पराली जलाने से लेकर जंगली पशुओं का आतंक तक, कई गंभीर चुनौतियाँ उजागर

सर्वेक्षण में सामने आया कि किसानों को सबसे अधिक जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, वे हैं—

  • पराली जलाने की मजबूरी
  • आवारा और जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान
  • अनियमित बिजली सप्लाई और वोल्टेज ट्रिपिंग
  • सिंचाई साधनों की भारी कमी
  • सड़कों पर मक्का सुखाने की बाध्यता
  • रासायनिक खाद की किल्लत
  • फसलों को समय पर न्यूनतम समर्थन मूल्य न मिलना

ये समस्याएँ सीधे-सीधे किसानों की आजीविका, उत्पादकता और खेत प्रबंधन को प्रभावित कर रही हैं।

तकनीकी प्रगति भी दिखाई दी—उन्नत मशीनों का बढ़ता उपयोग

टीम ने कई गांवों में किसानों द्वारा अपनाई जा रही आधुनिक तकनीकों को सराहा। इनमें शामिल हैं—

  • ड्रिप सिंचाई
  • जीरो टिल सीड ड्रिल
  • पैडी राउंड स्ट्रॉ बेलर
  • क्रॉलर ट्रैक कंबाइन हार्वेस्टर

ये मशीनें किसानों की लागत कम करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मददगार साबित हो रही हैं।

फसल विविधता में भी सकारात्मक रुझान

सर्वेक्षण में पाया गया कि—

  • धान–गेहूं चक्र के पार जाकर किसान मक्का और चना की ओर बढ़ रहे हैं।
  • कुछ क्षेत्रों में लाख और कपास जैसी वैकल्पिक फसलें भी उभर रही हैं।

यह विविधता किसानों को आय के नए स्रोत उपलब्ध करा रही है।

जल संरक्षण में पंचायत और कृषि विभाग की सक्रियता

गांवों में जल संरक्षण के लिए—

  • पंचायतों द्वारा तलैया,
  • कृषि विभाग द्वारा बलराम तालाब

खुदवाना, सिंचाई का नया सहारा बन रहा है। इससे किसानों को जीवन रक्षक सिंचाई उपलब्ध हो रही है।

कई हितधारकों से मिली महत्वपूर्ण जानकारियाँ

अध्ययन टीम ने निम्नलिखित हितधारकों से संवाद कर उनके अनुभव और सुझाव भी संकलित किए—

  • किसान एवं प्रोग्रेसिव किसान
  • कृषि विज्ञान केंद्र के अधिकारी
  • आत्मा परियोजना अधिकारी
  • मछली पालन एवं पशुपालन अधिकारी
  • ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी
  • मिल मालिक
  • गोदाम संचालक

इन सभी के विचारों ने गांवों में बदलते कृषि परिदृश्य को समझने में मदद की।

15 दिसंबर को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तृत प्रस्तुतीकरण

मुंबई में होने वाले प्रस्तुतीकरण में—

  • सर्वेक्षण रिपोर्ट
  • डेटा विश्लेषण
  • किसानों की समस्याएँ
  • समाधान मॉडल
  • जलवायु अनुकूल सूचकांक का संशोधित स्वरूप

सामने रखा जाएगा।

यदि इस सूचकांक को मंजूरी मिलती है, तो इसे देशभर में कृषि विकास के मानक मॉडल के रूप में लागू किया जा सकता है।

देश के नीति निर्धारकों के लिए होगा महत्वपूर्ण दस्तावेज

यह शोध—
✔ कृषि नीति नियोजन
✔ जलवायु केंद्रित योजनाओं
✔ ग्रामीण विकास कार्यक्रमों
✔ कृषि विस्तार कार्यों

के लिए मजबूत आधार प्रदान करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन भविष्य में किसानों की जलवायु सजगता और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में क्रांतिकारी साबित हो सकता है।

 

 

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