श्रवण कुमार की कथा सुनाकर भाव-विभोर कर रहे वासुदेव संप्रदाय के राम वासुदेव और साथी
गाडरवारा में वासुदेव संप्रदाय के कलाकारों द्वारा श्रवण कुमार की मार्मिक कथा का लोकगायन, माता-पिता की सेवा और भक्ति का जीवंत संदेश।

गाडरवारा। वासुदेव वसुदेवा संप्रदाय से जुड़े कलाकार इन दिनों नगर गाडरवारा एवं आसपास के गांवों में घर-घर जाकर लोककथा प्रस्तुत कर रहे हैं। माता-पिता की सेवा, त्याग और श्रद्धा के प्रतीक श्रवण कुमार की कथा जब यह कलाकार अपने स्वर और भाव से सुनाते हैं, तो श्रोताओं की आंखें नम हो जाती हैं।
बैतूल जिले से आए राम वासुदेव, विष्णु वासुदेव, जालसाराम वासुदेव सहित अन्य वासुदेव बंधु पारंपरिक पीताम्बर वस्त्र धारण किए, सिर पर मोरपंख सजाकर और हाथों में खड़ताल लिए इस कथा का गायन कर रहे हैं। वे लोगों से दान ग्रहण करते हुए धर्म, भक्ति और संस्कारों का संदेश दे रहे हैं।

कथा का सार
लोककथा में बताया गया है कि श्रवण कुमार की पत्नी एक विशेष प्रकार की दो भागों वाली मटकी बनवाती है — जिसमें वह एक तरफ मीठी खीर और दूसरी तरफ नमक वाले चावल बनाती थी। रोज़ श्रवण कुमार को मीठी खीर और अपने अंधे सास-ससुर को नमक मिले चावल परोसती थी।
एक दिन जब श्रवण कुमार गलती से अपने पिता की थाली में खीर चखते हैं, तब सच्चाई सामने आती है। वे स्तब्ध रह जाते हैं कि उनकी पत्नी इतने दिनों से वृद्ध माता-पिता को नमक वाले चावल खिला रही थी। आत्मग्लानि और क्रोध में वे पत्नी का परित्याग कर माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर चार धाम यात्रा पर निकल पड़ते हैं।
लोक गायन की झलक
वासुदेव संप्रदाय के कलाकार इस कथा को लय-ताल, खड़ताल और मधुर स्वर में गाते हैं। यह प्रस्तुति न केवल मनोरंजक है बल्कि समाज को माता-पिता की सेवा और श्रद्धा का गहरा संदेश देती है।
परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं वासुदेव बंधु
आज की युवा पीढ़ी जहां आधुनिकता में व्यस्त हो गई है, वहीं पुराने वासुदेव समुदाय के लोग आज भी इस सनातन परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। उनकी वेशभूषा, गायन शैली और कथा-वाचन लोगों को पुरातन संस्कृति की झलक दिखाते हैं।
निष्कर्ष
गाडरवारा और आसपास के क्षेत्रों में वासुदेव संप्रदाय के कलाकारों द्वारा श्रवण कुमार की कथा का गायन धार्मिकता और संस्कृति के संरक्षण का प्रतीक है। यह कथा आज भी लोगों को यह संदेश देती है कि माता-पिता की सेवा ही सच्चा धर्म है।







