ओशो जन्म महोत्सव पर तीन दिवसीय ध्यान शिविर संपन्न
गाडरवारा के ओशो लीला आश्रम में देश–विदेश से पहुँचे संन्यासी; ध्यान, प्रवचन, मौन-ध्यान यात्रा और उत्सव के रंग में डूबा आश्रम परिसर

गाडरवारा। विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक, आध्यात्मिक आचार्य और ध्यान क्रांति के प्रवर्तक रजनीश ओशो के 11 दिसंबर जन्म महोत्सव पर स्थानीय ओशो लीला आश्रम में तीन दिवसीय भव्य ध्यान शिविर का आयोजन संपन्न हुआ। यह शिविर 9 से 11 दिसंबर तक स्वामी ध्यान आकाश के सानिध्य में आयोजित हुआ, जिसमें देश-विदेश से आए ओशो संन्यासियों और अनुयायियों ने भाग लिया।
तीन दिनों तक आश्रम परिसर ध्यान, संगीत, मौन, प्रवचन और उत्सव के अद्भुत वातावरण में डूबा रहा। संन्यासियों ने ओशो की विभिन्न ध्यान विधियों—डायनामिक ध्यान, कुंडलिनी ध्यान, नादब्रह्म, विपस्सना, हृदयसूत्र ध्यान—का अभ्यास किया।
प्राकृतिक वादियों में गूंजा “ओशो आए, आनंद लाए”
गाडरवारा के बाहरी क्षेत्र में स्थित ओशो लीला आश्रम की प्राकृतिक शांति और हरियाली ने संन्यासियों के अनुभव को और गहरा किया।
11 दिसंबर की शाम को कुंडलिनी ध्यान के बाद सभी संन्यासियों ने उत्साह और प्रेमभाव के साथ ओशो का जन्म दिवस मनाया।
आश्रम “ओशो आए, आनंद लाए – जय ओशो” और “ओशो एक प्रेम हैं” जैसे नारों से देर तक गूंजता रहा। संन्यासियों ने केक काटकर उत्सव की परंपरा निभाई और संगीत ध्यान में झूमकर उत्सव को और ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
देश–विदेश से बड़ी संख्या में संन्यासियों का आगमन
शिविर में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, दिल्ली सहित कई राज्यों के अलावा नेपाल, रूस, जर्मनी, ब्राज़ील और जापान से भी ओशो अनुयायी पहुँचे।
आश्रम के मीडिया प्रभारी स्वामी राजेश नीरस ने बताया कि—
“ओशो के 11 दिसंबर जन्म महोत्सव से लेकर 19 जनवरी मृत्यु महोत्सव तक देश-विदेश से संन्यासियों का प्रवाह गाडरवारा और ओशो लीला आश्रम में निरंतर बना रहता है। यह समय ओशो के प्रेमियों के लिए वार्षिक उत्सव जैसा होता है।”
संन्यासियों ने इस दौरान ओशो की ध्यान विधियों, ओशो संगीत, नृत्य और मौन सत्रों के माध्यम से गहन आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त किए।
ओशो की क्रीड़ास्थली गाडरवारा का महत्व
गाडरवारा वह भूमि है जहाँ ओशो का बाल्यकाल और किशोरावस्था गुज़री।
- ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 को रायसेन जिले के कुचवाड़ा में हुआ था।
- करीब 7 वर्ष की आयु में वे अपने माता-पिता के साथ गाडरवारा आ गए।
- उन्होंने प्राथमिक शिक्षा गंज प्राथमिक शाला और माध्यमिक-उच्चतर शिक्षा आदर्श स्कूल में प्राप्त की।
- गाडरवारा का सार्वजनिक पुस्तकालय आज भी ओशो द्वारा पढ़ी गई अमूल्य पुस्तकों को सुरक्षित रखे हुए है।
शक्कर नदी, रामघाट, ओशो की मृत्यु-प्रयोग स्थली और ओशो की ध्यान-लीलाओं से जुड़े स्थान आज भी अनुयायियों के लिए दिव्य अनुभव की जगह बने हुए हैं।
ध्यान, मौन और संगीत से गुंजित रहा आश्रम परिसर
तीन दिवसीय शिविर में प्रतिदिन सुबह डायनामिक ध्यान से शुरुआत होती थी। दिन में ओशो के प्रवचनों पर आधारित ध्यान यात्रा, फिर रात में संगीत और कुंडलिनी ध्यान का आयोजन हुआ।
संन्यासियों ने बताया कि गाडरवारा की ऊर्जामय भूमि और ओशो लीला आश्रम का शांत वातावरण आत्मानुभूति के लिए अद्भुत प्रेरणा देता है।
ओशो स्थलों के दर्शन को उमड़ा उत्साह
शिविर के समापन के बाद देश-विदेश से आए संन्यासियों ने गाडरवारा में स्थित ओशो के प्रमुख स्थलों जैसे—
- ओशो की अध्ययन स्थली (पुस्तकालय)
- रामघाट और शक्कर नदी
- ओशो बाल्यकाल की गतिविधियों से जुड़े स्थान
- ओशो लीला आश्रम परिसर
का भ्रमण किया और कृतज्ञता व्यक्त की।







