नर्मदापुरम में प्रतिभा दम तोड़ रही, सिस्टम सो रहा — विवेक सागर निकले, बाकी खिलाड़ी बर्बादी की कगार पर
जहाँ से अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तैयार हुए, वहीं आज सैकड़ों खिलाड़ी सही प्लेटफॉर्म के लिए दर-दर भटक रहे हैं

संवाददाता राकेश पटेल इक्का
नर्मदापुरम—विवेक सागर जैसे अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी की धरती आज खिलाड़ियों की कब्रगाह बनती जा रही है। हकीकत यह है कि जिस जिले ने देश को वर्ल्ड क्लास हॉकी प्लेयर दिया, वही जिला आज अपनी प्रतिभाओं को फर्श से उठाने तक की हालत में नहीं है। खिलाड़ी मेहनत कर रहे हैं, पसीना बहा रहे हैं, लेकिन सिस्टम इतना सड़ा हुआ, इतना बेतरतीब और इतना लापरवाह है कि प्रतिभाएँ मैदान से पहले फाइलों में दम तोड़ रही हैं।
हॉकी फीडर सेंटर की हालत ऐसी है कि यहाँ खिलाड़ी पैदा नहीं हो रहे—यहीं खिलाड़ी खत्म हो रहे हैं। प्रशिक्षकों की जन्मतिथियों से लेकर खिलाड़ियों के दस्तावेजों तक में ऐसी घोर गड़बड़ी सामने आई कि साबित हो गया कि विभाग को खिलाड़ियों से ज्यादा फॉर्म और फर्जीवाड़े की चिंता है। अभिलेखों में चार-चार जगह अलग-अलग जन्मतिथि, दस्तावेज गायब, और ज़िम्मेदार अधिकारी वर्षों तक मौज में बैठे रहे—यह विभागीय लापरवाही नहीं, यह खिलाड़ियों की करियर हत्या है।
विवेक सागर देश के लिए खेलते हैं, मेडल जीतते हैं, पूरे प्रदेश का नाम रोशन करते हैं। लेकिन उसी जिले के बाकी खिलाड़ी?
वे न मैदान पा रहे, न प्रशिक्षण, न अवसर।
उनसे कहा जाता है—“मेहनत करो, आगे बढ़ो।”
लेकिन मैदान पर मेहनत करने से पहले उन्हें विभागों की बहरी व्यवस्था से लड़ना पड़ता है।
सच साफ है—
अगर विवेक सागर जैसा खिलाड़ी आज सिस्टम में प्रवेश करता तो शायद वह भी किसी फाइल के नीचे दब जाता और कभी अंतरराष्ट्रीय हॉकी मैदान तक न पहुँच पाता।
उधर इटारसी और नर्मदापुरम के मैदानों की हालत किसी खंडहर से कम नहीं। नाले जगह-जगह जाम, अतिक्रमण हटाने का नाटक, और खिलाड़ियों को वह सुविधाएँ नसीब नहीं जो एक जिला स्तर का खिलाड़ी भी डिसर्व करता है।
सरकार हॉकर्स कॉर्नर बनाने के नाम पर 50 लाख खर्च करने की बात करती है, लेकिन खिलाड़ियों के लिए सही मैदान और सही प्रशिक्षण की बात आते ही फाइलें गायब हो जाती हैं।
विधानसभा में सवाल उठता है, लेकिन जवाब वही—
“पुस्तकालय में परिशिष्ट में जानकारी रखी गई है।”
यानी खिलाड़ी मैदान में मरते रहें, और विभाग कागज़ में नाचता रहे।
कहने को नर्मदापुरम प्रतिभा की भूमि है, लेकिन आज यह प्रतिभाओं की बर्बादी का गवाह बनता जा रहा है। जो खिलाड़ी सिर्फ एक सही दिशा, सही कोच और सही अवसर से देश का नाम रौशन कर सकते हैं, वे व्यवस्था की लाश उठाते-उठाते अपने सपनों को दफना रहे हैं।
यदि हालात ऐसे ही रहे, तो अगला विवेक सागर नर्मदापुरम से नहीं निकलेगा—
बल्कि नर्मदापुरम से निकलकर कहीं और जाकर खुद को बचाएगा।







