ग्रामीण जनमानस के प्रेरणास्रोत ‘मास्साब’ स्व. मोहनलाल वर्मा जी की प्रथम पुण्यतिथि पर विशेष
ग्रामीण जनमानस के प्रेरक मास्साब स्व. मोहनलाल वर्मा की प्रथम पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धांजलि। शिक्षा, सेवा और समाज सुधार में उनके योगदान को जानें।

संवाददाता अवधेश चौकसे
गाडरवारा/सालीचौका। शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक चेतना के अमर वाहक रहे मास्साब स्व. मोहनलाल वर्मा जी की प्रथम पुण्यतिथि पर क्षेत्रभर में उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी जा रही है। सादगी, ईमानदारी और सेवा की मिसाल रहे मास्साब का जीवन पूरी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है।
प्रारंभिक जीवन : सरलता में महानता
1 अप्रैल 1944 को नरसिंहपुर जिले के ग्राम सालीचौका में जन्मे मास्साब बचपन से ही मेधावी, जिज्ञासु और अनुशासित प्रवृत्ति के थे।
पिता श्री नन्हेलाल वर्मा और माता श्रीमती मीराबाई के संस्कारों ने उन्हें सत्य, सादगी और परोपकार की राह पर अग्रसर रखा।
उच्च शिक्षा साइंस कॉलेज, जबलपुर से प्राप्त की।
साथ ही वॉलीबॉल, फुटबॉल व कबड्डी में उनकी उपलब्धियों ने नेतृत्व और टीम भावना को और मजबूत किया।
शिक्षा के प्रकाशस्तंभ : एक आदर्श शिक्षक और दूरदर्शी अधिकारी
मास्साब ने 1965 में सहायक अध्यापक के रूप में अपने सेवा जीवन की शुरुआत की।
उनकी कक्षा सिर्फ पढ़ाई का स्थान नहीं थी, बल्कि संस्कार, अनुशासन और मानवीय मूल्यों की प्रयोगशाला हुआ करती थी।
बरमान, इमझिरा, करकबेल, बसुरिया और तेंदूखेड़ा में उनका शिक्षण आज भी विद्यार्थियों के हृदय में जीवित है।
1989 में वे परियोजना अधिकारी बने और 2006 में सेवानिवृत्त हुए।
आज भी हजारों लोग गर्व से कहते हैं—
“हम वह हैं, जो मास्साब ने हमें बनाया।”
समाज सुधारक के रूप में साहसी नेतृत्व
मास्साब केवल शिक्षक ही नहीं, बल्कि समाज के निर्भीक मार्गदर्शक थे।
उनके प्रयासों से सालीचौका में वीरांगना अवंतीबाई चौराहा स्थापित हुआ, जिसमें दीदी उमा भारती की उपस्थिति रही।
उन्होंने हमेशा दहेज प्रथा, मृत्यु भोज और अन्य कुरीतियों का डटकर विरोध किया।
भोपाल अधिवेशन में किया गया उनका संकल्प—
“मेरे निधन पर मृत्यु भोज नहीं होगा।”
पूरा परिवार आज भी उस प्रेरणादायक संकल्प पर दृढ़ है।
संघर्षों में तपकर बने आदर्श
कम आयु में माता का देहांत, जीवन में अनेक चुनौतियाँ, संघर्ष, सामाजिक विरोध—
परंतु मास्साब कभी विचलित नहीं हुए।
वे कहते थे—
“समस्याओं से टूटना नहीं, बल्कि उनसे मजबूत होकर बाहर आना।”
उन्होंने इसे अपने जीवन से सिद्ध किया।
2 दिसंबर 2024 : एक युग का अवसान
उनके देहावसान से समाज, शिक्षा जगत और जनमानस को अपूरणीय क्षति हुई।
वे शिक्षक, साहित्यकार, विचारक और सच्चे समाजसेवी थे, जिनका जीवन सादगी और संघर्ष का अद्वितीय संगम रहा।
उनके पथ पर चलना ही सच्ची श्रद्धांजलि
आज उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर हम सभी संकल्प लें कि—
- शिक्षा को सर्वोपरि रखें,
- कुरीतियों से दूर रहें,
- समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी बनें,
- और हर परिस्थिति में सत्य व सकारात्मकता को मार्गदर्शक बनाएं।
“उनका जीवन एक ऐसी पुस्तक है, जिसे पढ़ने वाला हर व्यक्ति बेहतर इंसान बन जाता है।”
आज हम विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए कहते हैं—
“मास्साब, आप शरीर रूप में भले हमारे बीच नहीं, पर आपके आदर्श और विचार सदैव हमारे मार्गदर्शक रहेंगे।”







