गाडरवारा में साहित्यिक संगोष्ठी: ‘मातृभाषा का महायज्ञ’ और ‘भाभी सखी सहेली’ का भव्य विमोचन

गाडरवारा। नगर में साहित्य और मातृभाषा के प्रति समर्पण का प्रेरक दृश्य उस समय देखने को मिला, जब श्रीमती निर्मला पाराशर और उनकी बेटी साक्षी पाराशर की नव प्रकाशित कृतियों का भव्य विमोचन समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन पूर्व विधायक साधना स्थापक , महंत बालकदास जी, पीएम श्री जवाहर नवोदय विद्यालय के प्राचार्य डॉ. अरुण तिवारी, स्थानीय पीजी कॉलेज की सेवानिवृत्त प्राध्यापक श्रीमती सुनीता गुप्ता के सारस्वत आतिथ्य तथा वरिष्ठ साहित्यकार कुशलेन्द्र श्रीवास्तव की अध्यक्षता में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की पूजा-अर्चना से हुआ। कु. विद्या मालवीय ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया। मंचासीन अतिथियों का पुष्पमाला से स्वागत राजेंद्र पाराशर, कपिल पाराशर, मंजुला शर्मा एवं अर्चना नामदेव द्वारा किया गया, जबकि स्वागत गीत कु. शीतल सोनी ने प्रस्तुत किया।
करतल ध्वनि के बीच श्रीमती निर्मला पाराशर की कृति मातृभाषा का महायज्ञ का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा के साथ हो रहा व्यवहार अत्यंत कष्टदायक है, और उसी पीड़ा को उन्होंने अपनी पुस्तक में व्यक्त किया है।
इसके पश्चात साक्षी पाराशर की कृति भाभी सखी सहेली का विमोचन किया गया। साक्षी ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज पारिवारिक रिश्ते अपेक्षाओं की भेंट चढ़ते जा रहे हैं, जबकि प्रेम, स्नेह और पारदर्शिता ही किसी भी रिश्ते को सशक्त बना सकती है—इसी भाव को उन्होंने अपनी रचना में अभिव्यक्त किया है।
इस अवसर पर चेतना परिवार की ओर से मंजुला शर्मा और विजय नामदेव ने दोनों रचनाकारों को सम्मानित किया। डॉ. मंजुला शर्मा ने दोनों कृतियों की प्रथम प्रति क्रय कर साहित्य के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया।
अपने उद्बोधन में सुनीता गुप्ता ने कहा कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए ऐसी कृतियों की अत्यंत आवश्यकता है। महंत बालकदास जी ने संयुक्त परिवार की महत्ता पर बल देते हुए कहा कि संयुक्त परिवार समाज को बेहतर दिशा प्रदान करते हैं और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत बनाते हैं।
डॉ. अरुण तिवारी ने कहा कि साहित्य सृजन सरल प्रक्रिया नहीं है, यह साहित्यकार के अंतर्मन के भावों का सजीव चित्रण होता है और समाज में जागरूकता फैलाने का माध्यम भी। कार्यक्रम के अध्यक्ष कुशलेन्द्र श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदी संस्कारों और संस्कृति की भाषा है। यदि हमारे बच्चे हिंदी से जुड़े रहेंगे तो वे अपनी संस्कृति और परंपराओं से भी जुड़े रहेंगे।
कार्यक्रम में डॉ. मंजुला शर्मा और महेश अधरूज ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन सत्यप्रकाश बसेड़िया ने तथा आभार प्रदर्शन नगेन्द्र त्रिपाठी ने किया। समारोह में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे, जिससे कार्यक्रम सफल और गरिमामय रहा।







