हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी, शादी के 10वें दिन नवविवाहित जोड़ा निकला मां नर्मदा की पैदल परिक्रमा पर
देवास जिले के खातेगांव निवासी शिवम यादव और रोशनी ने विवाह के 10वें दिन मां नर्मदा की 3500 किमी पैदल परिक्रमा का संकल्प लिया। पढ़ें प्रेरक कहानी।

देवास/खातेगांव (मध्यप्रदेश)। आधुनिक दौर में जहां नवविवाहित जोड़े हनीमून के लिए विदेशों का रुख करते हैं, वहीं देवास जिले के खातेगांव निवासी शिवम यादव और उनकी पत्नी रोशनी ने विवाह के महज दसवें दिन एक अलग ही मार्ग चुना। हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी थी कि दोनों ने मां नर्मदा की पैदल परिक्रमा का कठिन संकल्प ले लिया।
शिवम यादव—जिनके पिता शासकीय शिक्षक हैं और माता एक कुशल गृहिणी—घर के इकलौते पुत्र हैं। अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद माता-पिता की सेवा को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने बाहर नौकरी नहीं की। परिवार की सहमति से विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ। सभी प्रसन्न थे, स्वयं दंपति भी। लेकिन विवाह के बाद उन्होंने जो निर्णय लिया, उसने सबको स्तब्ध कर दिया।

3500 किमी की कठिन यात्रा, वह भी पैदल
मां नर्मदा की पैदल परिक्रमा लगभग 3500 किलोमीटर की मानी जाती है। दुर्गम रास्ते, मौसम की मार और सीमित संसाधनों के बीच यह यात्रा कई संत-महात्मा 3 वर्ष 3 माह 13 दिन में पूर्ण करते हैं। ऐसे में नवविवाहित जोड़े का यह संकल्प सामान्य नहीं, बल्कि अद्भुत आस्था और साहस का प्रतीक है।
आज के समय में जहां सुविधाएं और भोग जीवन का लक्ष्य बनते जा रहे हैं, वहीं शिवम-रोशनी ने त्याग, साधना और आत्मविजय का मार्ग चुना। उनका मानना है कि मां नर्मदा की परिक्रमा केवल यात्रा नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव है—जो आत्मविश्वास, सात्विकता, संतोष और मन पर विजय का मार्ग दिखाती है।
नर्मदा—एकमात्र नदी जिसकी होती है परिक्रमा
भारत में मां नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी हैं, जिनकी विधिवत परिक्रमा की जाती है। मान्यता है कि नर्मदा मैया के दर्शन मात्र से कल्याण होता है। इसी विश्वास के साथ जंगलों में रहने वाले साधारण जन से लेकर बड़े-बड़े विद्वान, साधु-संत और धनाढ्य जन भी यह परिक्रमा करते हैं।
रोशनी का त्याग भी उतना ही प्रेरक
यह कहानी केवल शिवम की नहीं, बल्कि रोशनी की भी है—जिसने विवाहोपरांत घर की सुख-सुविधाओं को त्याग कर महीनों की पदयात्रा और कष्ट सहने का संकल्प स्वीकार किया। यह भारतीय नारी की उसी परंपरा का प्रतीक है, जो सीता के चरित्र को आत्मसात कर श्रद्धा और संकल्प के साथ आगे बढ़ती है।

युवा पीढ़ी के लिए संदेश
शिवम-रोशनी जैसे युवा यह संदेश देते हैं कि भारत भोग की नहीं, त्याग की परंपरा का देश है। जहां “वंदे मातरम्” केवल नारा नहीं, बल्कि साधना है। ऐसी युवा पीढ़ी के रहते भारतीय संस्कृति का आधार अडिग है।
प्रभु से यही कामना है कि मां नर्मदा की यह पवित्र परिक्रमा सकुशल, सफल और सार्थक हो।
नर्मदा मैया की जय!







