सूचना के अधिकार से जुड़ी जानकारी उपलब्ध न कर सके अस्पताल प्रभारी, वित्तीय अनियमितताओं की शंका — पत्रकारों ने की निष्पक्ष जांच की मांग

गाडरवारा (नरसिंहपुर)।
शासकीय अस्पताल गाडरवारा में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी न देने के मामले ने अब गंभीर रूप ले लिया है।
अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए स्थानीय पत्रकारों ने नगर निरीक्षक विक्रम रजक को ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष जांच की मांग की है।
पत्रकारों का आरोप है कि अस्पताल में कई वित्तीय अनियमितताएं की गई हैं, और जब उनसे संबंधित जानकारी मांगी गई तो प्रभारी अधिकारी ने न केवल जानकारी देने से इनकार किया, बल्कि झूठी शिकायतें दर्ज कराकर पत्रकारों को डराने का प्रयास किया।
RTI आवेदन पर जानकारी न देना बना विवाद की जड़
पत्रकार राजेश शर्मा ने कुछ माह पूर्व शासकीय अस्पताल गाडरवारा से आरटीआई आवेदन के माध्यम से वित्तीय और प्रशासनिक विवरण मांगे थे।
इस आवेदन में अस्पताल में हुए निर्माण कार्यों, उपकरण खरीद, मरीजों से वसूली जा रही फीस और अन्य योजनाओं से जुड़े खर्चों की जानकारी मांगी गई थी।
आरटीआई अधिनियम 2005 के अनुसार, किसी भी सरकारी विभाग को 30 दिनों के भीतर जानकारी देना अनिवार्य है।
लेकिन करीब डेढ़ से दो महीने बीत जाने के बाद भी अस्पताल प्रभारी डॉ. उपेंद्र वस्त्रकार द्वारा जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
शुक्रवार को जब राजेश शर्मा उक्त जानकारी लेने के लिए स्वयं अस्पताल पहुंचे, तो डॉक्टर ने जानकारी देने से मना करते हुए कहा —
“आप सक्षम अधिकारी के पास अपील करें, मैं जानकारी नहीं दे सकता।”
जानकारी मांगने पर डॉक्टर ने दर्ज कराई शिकायत
सूत्रों के अनुसार, जानकारी न मिलने के बाद राजेश शर्मा अस्पताल से बाहर आ गए।
कुछ ही घंटे बाद, यह खबर आई कि अस्पताल प्रभारी डॉ. वस्त्रकार ने पुलिस में झूठी शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें पत्रकार पर सरकारी कार्य में बाधा डालने जैसे आरोप लगाए गए हैं।
शाम को करीब 7 बजे डॉक्टर उपेंद्र वस्त्रकार अस्पताल स्टाफ के साथ थाने पहुंचे और ज्ञापन सौंपा।
पत्रकारों का कहना है कि यह कदम सिर्फ सूचना अधिकार की मांग को दबाने और डराने की रणनीति थी।
पत्रकारों ने किया विरोध, कहा — “RTI मांगना अपराध नहीं”
पत्रकारों का कहना है कि सरकारी अस्पताल में लंबे समय से मरीजों से जांच के नाम पर 150 से 300 रुपए तक की वसूली की जा रही है, जबकि सरकारी नियमों के अनुसार, ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
ऐसे में जब पत्रकारों ने इन गड़बड़ियों की जांच के लिए RTI का सहारा लिया, तो अस्पताल प्रशासन ने झूठे आरोप लगाकर दबाव बनाने की कोशिश की।
पत्रकारों द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है —
“एक पत्रकार को सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। लेकिन अस्पताल प्रशासन ने जानकारी देने से बचने के लिए झूठी शिकायत दर्ज करवाई है, जो निंदनीय है।”
पत्रकारों ने यह भी बताया कि डॉक्टर वस्त्रकार ने बातचीत के दौरान अपशब्दों का प्रयोग किया और पत्रकारों को ब्लैकमेलर तक कहा, जिससे पूरा पत्रकार समुदाय आहत है।
CCTV फुटेज और वॉइस रिकॉर्डिंग की जांच की मांग
पत्रकारों ने पुलिस प्रशासन से अनुरोध किया है कि घटना के समय की CCTV फुटेज और वॉइस रिकॉर्डिंग की जांच की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि घटना के समय अस्पताल परिसर में वास्तव में क्या हुआ था।
ज्ञापन में यह भी मांग की गई है कि जांच के दौरान पांच सदस्यीय पत्रकार प्रतिनिधि दल की उपस्थिति में विवेचना की जाए।
पत्रकारों का कहना है कि यदि कोई गलत आचरण हुआ होता तो CCTV में उसका प्रमाण होता।
इसलिए, डॉक्टरों के आरोप निराधार हैं और जांच से पूरी सच्चाई सामने आ जाएगी।
वित्तीय अनियमितताओं की गहराई तक जांच की मांग
पत्रकार राजेश शर्मा के अनुसार, अस्पताल में कई ऐसे कार्य हुए हैं जिनमें कागजों पर खर्च दिखाया गया है, लेकिन जमीन पर उसका कोई प्रमाण नहीं है।
उन्होंने बताया कि निर्माण कार्यों, मरम्मत और उपकरण खरीदी में कई वित्तीय अनियमितताएं की गई हैं।
राजेश शर्मा ने कहा —
“मैंने सूचना के अधिकार के तहत सिर्फ वह जानकारी मांगी थी जो सार्वजनिक है। लेकिन अस्पताल प्रशासन इससे डर गया। यह बात साफ है कि कुछ छिपाया जा रहा है।”
RTI कानून क्या कहता है?
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत,
- हर सरकारी अधिकारी को निर्धारित समयसीमा में मांगी गई जानकारी देना अनिवार्य है।
- जानबूझकर जानकारी न देने पर संबंधित अधिकारी पर धारा 20 के तहत जुर्माना और अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।
- किसी नागरिक को इस प्रक्रिया के कारण धमकाना या प्रताड़ित करना कानूनन अपराध है।
इस मामले में अस्पताल प्रभारी का रवैया RTI अधिनियम की भावना के खिलाफ माना जा रहा है।
पत्रकारों की एकजुटता और अगला कदम
इस पूरे प्रकरण के बाद गाडरवारा के सभी पत्रकार एकजुट हो गए हैं।
उन्होंने पुलिस प्रशासन से निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है।
साथ ही चेतावनी दी है कि यदि मामले की जांच में ढिलाई बरती गई, तो वे कलेक्टर और उच्चाधिकारियों से सामूहिक शिकायत करेंगे।
पत्रकारों ने कहा —
“हम सिर्फ सच चाहते हैं। अगर अस्पताल प्रशासन सही है, तो जांच से उन्हें डरना नहीं चाहिए।”
निष्कर्ष
गाडरवारा शासकीय अस्पताल का यह मामला अब सिर्फ RTI विवाद नहीं रहा — यह सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन गया है।
एक तरफ पत्रकार सूचना के अधिकार के तहत जवाब मांग रहे हैं, तो दूसरी ओर अस्पताल प्रशासन का रवैया सवालों के घेरे में है।
अब देखना यह होगा कि क्या जांच से अस्पताल की वित्तीय गड़बड़ियों का सच सामने आता है या नहीं।







